सरकारी वकीलों की कमी पर हाई कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता सोर्स- सोशल मीडिया
नागपुर

त्वरित सुनवाई का अधिकार सिर्फ कागजों पर! सरकारी वकीलों की कमी पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त

Lower Court Backlog: नागपुर की निचली अदालतों में लंबित मामलों और सरकारी वकीलों की कमी पर हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार कागजों तक सीमित हो गया है।

अंकिता पटेल

Maharashtra Court Case Backlog: नागपुर निचली अदालतों में लंबित मुकदमों के अंबार और सहायक सरकारी वकीलों की भारी कमी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए न्यायाधीश एम।एम। नेर्लिकर ने कड़ा रुख अपनाया है। एक मामले पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान के तहत मिला 'त्वरित सुनवाई' का अधिकार केवल कागजों तक सीमित होकर रह गया है।

इस गंभीर प्रणालीगत विफलता को देखते हुए हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका दर्ज करने का आदेश दिया। कोर्ट में 'प्रज्वल उर्फ चित्त्य सुरेश हिवराले बनाम महाराष्ट्र राज्य' की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान उक्त खामियां उजागर हुई।

सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में यह बात लाई गई कि दरियापुर की अदालत में पिछले एक साल से नियमित सरकारी वकील के न होने के कारण मामले में एक भी गवाह से पूछताछ नहीं की जा सकी जिससे ट्रायल पूरी तरह ठप पड़ गया।

संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन

अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य, अब्दुल रहमान अंतुले बनाम आर।एस। नायक, और करतार सिंह बनाम पंजाब राज्य) का हवाला दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि 'त्वरित सुनवाई' संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का एक अनिवार्य हिस्सा है। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि राज्य मुकदमों के बैकलॉग का बहाना बनाकर आरोपियों को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रख सकता।

न्याय प्रणाली के तीन स्तंभों में असंतुलन

न्या। नेर्लिकर ने कहा कि पूरी न्याय प्रणाली तीन मुख्य स्तंभों अभियोजन, बचाव पक्ष और अदालत पर टिकी है। राज्य और अभियोजन का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे बिना अनावश्यक स्थगन के गवाहों और सबूतों को पेश करें लेकिन जब एक ही सरकारी वकील पर जरूरत से ज्यादा मामलों का बोझ डाल दिया जाएगा तो वह किसी भी मामले को प्रभावी ढंग से नहीं संभाल पाएगा। तारीखों पर तारीखें मिलती हैं और उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।

त्वरित सुनवाई होने की बहुत कम संभावना

अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि मौजूदा सरकारी वकीलों की संख्या के साथ मुकदमों की त्वरित सुनवाई होने की बहुत कम संभावना है। व्यापक जनहित को देखते हुए अदालत ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया कि वे इस पूरी स्थिति पर एक नोट तैयार करें।

इस नोट को हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के वरिष्ठतम प्रशासनिक न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा ताकि इस गंभीर मुद्दे पर उचित दिशा-निर्देश जारी किए जा सकें।

चौंकाने वाले हैं सरकारी वकीलों की कमी के आंकड़े

इस खुलासे के बाद हाई कोर्ट ने विधि एवं न्याय विभाग और अभियोजन निदेशक से नागपुर बेंच के अधिकार क्षेत्र वाले जिलों में लंबित मामलों और एपीपी की उपलब्धता की रिपोर्ट तलब की। रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं।

  • चंद्रपुर: यहां 3077 लंबित मुकदमों को सभालने के लिए केवल 5 सरकारी वकील मौजूद है।

  • वरोरा स्थिति यहां और भी बदतर है। 1990 लंबित मुकदमों का भार मात्र 1 सरकारी वकील के कंधों पर है।

  • वर्षा यहां 2597 लंबित मुकदमों के लिए कुल 17 एपीपी (2) गृह विभाग और 15 विधि विभाग के अंतर्गत) नियुक्त हैं।

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