अक्षय तृतीया, पितृ पूजन( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
नागपुर

अक्षय तृतीया 2026: पितृ पूजन और पलाश पत्रावली की खास परंपराएं, जानिए धार्मिक मान्यता

Nagpur Akshaya Tritiya: अक्षय तृतीया पर पितृ पूजन, पलाश पत्रावली और कौए को नैवेद्य अर्पण की परंपरा से जुड़ी मान्यताएं आज भी जीवंत हैं, जो श्रद्धा और संस्कृति का प्रतीक हैं।

अंकिता पटेल

Nagpur Palash Leaves Rural Culture: कलमेश्वर अक्षय तृतीया हिंदू धर्म का एक अत्यंत शुभ और पवित्र पर्व माना जाता है, जो वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 19 अप्रैल को मनाया जा रहा है, इसे 'साढ़े तीन मुहूर्त' में शामिल किया जाता है, इसलिए इस दिन बिना विशेष मुहूर्त के विवाह, गृहप्रवेश और नए कार्यों की शुरुआत शुभ मानी जाती है।

इस दिन पितृ पूजन का विशेष महत्व होता है। लोग अपने घरों में पूर्वजों के चित्र के सामने नया मिट्टी का कलश स्थापित कर उसमें जल भरते हैं और खस (बाला) डालकर उसे सुगंधित बनाते हैं।

यह जल पितरों को अर्पित कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने की परंपरा है। अक्षय तृतीया पर पलाश के पत्तों से बनी पत्रावली और दौने का विशेष महत्व माना जाता है।

आधुनिक समय में भले ही कागज और प्लास्टिक की प्लेटों का उपयोग बढ़ गया हो, लेकिन इस दिन धार्मिक अनुष्ठानों में पलाश पत्रावली का उपयोग शुभ माना जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी जीवंत है। इन पत्रावलियों में दाल-भात, भजे, कुरडई, पापड़, कच्ची कैरी का आमरस और अन्य पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं, जिससे पित्तरों की आत्मा को तृप्ति मिलने की मान्यता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन कौए को नैवेद्य अर्पित करना भी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि कौए को पितरों का प्रतीक माना जाता है। लोग अपने आंगन या छत पर भोजन रखकर पितरों का स्मरण करते हैं।

पर्व के चलते बाजारों में भी खास रौनक देखने को मिलती है। पूजा सामग्री की दुकानों पर मिट्टी के कलश, कच्ची कैरी, गेहूं, खस और अन्य पूजन सामग्री की मांग बढ़ जाती है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों से लोग पलाश के पत्तों की पत्रावली बेचने शहरों में आते हैं, जिससे उनकी बिक्री में भी इजाफा होता है।

धार्मिक अवसरों पर पत्रावली का महत्व बरकरार

समय के साथ कुछ परंपराओं में बदलाव आया है। पहले शादी और अन्य समारोहों में भी पलाश पत्रावली का व्यापक उपयोग होता था, लेकिन अब आधुनिक व्यवस्थाओं के चलते इसका उपयोग कम हो गया है। फिर भी धार्मिक अवसरों पर इसका महत्व आज भी बरकरार है।

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