

P Chidambaram on PM Modi Statement: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम के बीच ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ जैसे तंज को लेकर सियासी जुबानी जंग तेज हो गई है। प्रधानमंत्री की टिप्पणियों पर पलटवार करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने बुधवार को कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहलाने पर खुशी और गर्व है। उन्होंने प्रधानमंत्री की ‘नाराज फूफा’ वाली टिप्पणी को भी बेमतलब बताया।
चिदंबरम ने प्रधानमंत्री पर नए-नए नारे और शब्द गढ़ने का तंज कसते हुए कहा कि ऐसे शब्द सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री खुद को कवि बताते हैं और नए शब्दों के साथ राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करते हैं।
पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि उन्हें ‘बेवकूफ नक्सल’ नहीं, बल्कि ‘दिमागी नक्सल’ कहा गया। उन्होंने प्रधानमंत्री के पुराने नारों का जिक्र करते हुए कहा कि पिछले वर्षों में कई नए नारे और राजनीतिक शब्द सामने आए हैं।
चिदंबरम ने कहा कि प्रधानमंत्री गुजराती में कविताएं लिखते हैं और इसी तरह नए शब्दों तथा नारों को भी गढ़ते हैं। उनके मुताबिक, ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जैसे नारों से लेकर ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ तक कई शब्द राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हैं।
चिदंबरम ने ‘नाराज फूफा’ टिप्पणी को लेकर कहा कि प्रधानमंत्री के ऐसे शब्द सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आ जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ को लेकर सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में मीम बनाए जा रहे हैं।
कांग्रेस नेता ने कहा कि उन्होंने जब सोशल मीडिया पर खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व जताया तो उनके पोस्ट को बड़ी संख्या में लोगों ने पसंद किया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वह यह नहीं जानते कि पोस्ट को पसंद करने वाले सभी लोग खुद को ‘दिमागी नक्सल’ मानते हैं या नहीं।
चिदंबरम के मुताबिक, सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि प्रधानमंत्री की इस तरह की भाषा लोगों के बीच चर्चा पैदा कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री भविष्य में भी नए शब्द ला सकते हैं, लेकिन उनके नजरिए से इन टिप्पणियों का कोई खास अर्थ नहीं है।
पी. चिदंबरम ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने इसे खराब प्रक्रिया और खराब कवायद करार दिया।
चिदंबरम ने दावा किया कि नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का नाम भी मतदाता सूची से हटाया गया है। उन्होंने प्रोफेसर सी.एन.आर. राव का नाम हटाए जाने का भी जिक्र किया।
कांग्रेस नेता ने कहा कि भारत में पैदा हुए और 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले व्यक्ति को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, ऐसे व्यक्ति से यह साबित करने की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए कि उसका जन्म भारत में हुआ है। चिदंबरम ने कहा कि यह साबित करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होनी चाहिए कि कोई व्यक्ति भारत में पैदा नहीं हुआ और अवैध प्रवासी के रूप में देश में आया है।
चिदंबरम ने SIR के अलग-अलग चरणों में मतदाता सूची से हटाए गए नामों के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, पहले चरण में करीब 65.1 लाख, दूसरे चरण में 6.5 करोड़ और तीसरे चरण में 6.1 करोड़ नाम हटाए गए। उन्होंने कुल संख्या करीब 13.30 करोड़ बताई।
उन्होंने हटाए गए नामों को वयस्क आबादी के अनुपात से जोड़ते हुए भी आंकड़े पेश किए और सवाल उठाया कि क्या इतने लोग बांग्लादेश या किसी अन्य देश से अवैध प्रवासी बनकर भारत आए थे। चिदंबरम ने इस स्थिति को हास्यास्पद बताया।
चिदंबरम की प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए गए भाषण के बाद आई। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ और वैचारिक नक्सलवाद जैसी सोच रखने वाले लोगों की पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने की अपील की थी।
प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि 2014 के बाद सरकार की कार्रवाई के चलते जंगलों में सक्रिय नक्सली हिंसा काफी हद तक खत्म हुई है। उन्होंने नक्सली हिंसा में 3,500 से अधिक सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने का भी जिक्र किया था।
पीएम मोदी ने यह आरोप भी लगाया था कि अतीत में ‘माओवादी मानसिकता’ रखने वाले कुछ लोग सरकारी समितियों और संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे तथा उन्होंने नीतियों को प्रभावित किया।
इसी बयान के बाद ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ जैसे शब्दों को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।