तुकाराम मुंढे और नरहरी झिरवल (सोर्स: सोशल मीडिया)
मुंबई

नरहरी झिरवल को क्यों रास नहीं आते तुकाराम मुंढे? समझिए FDA कमिश्नर और मंत्री के बीच खटास का पूरा कारण

Tukaram Mundhe vs Narhari Zirwal: तुकाराम मुंढे और मंत्री नरहरी झिरवल के बीच विवाद क्यों चर्चा में है? मिथेनॉल कंपनियों पर कार्रवाई, लाइसेंस रद्द करने और मंत्री की रोक के पीछे की पूरी कहानी जानें।

गोरक्ष पोफली

Highlights

  • महाराष्ट्र के एफडीए विभाग में मंत्री और कमिश्नर के बीच टकराव बढ़ा है।

  • पुणे में हुई जहरीली शराब त्रासदी के बाद कमिश्नर ने कड़ी कार्रवाई की।

  • मंत्री द्वारा एक कंपनी की कार्रवाई पर अस्थायी रोक लगाने से नया विवाद उपजा।

Tukaram Mundhe Narhari Zirwal Controversy: एक तरफ राजनीति है, तो दूसरी तरफ कर्तव्य। राजनीति किसी की सगी नहीं होती और प्रशासन में कर्तव्य निभाने का दावा करने वाला अधिकारी भी हर किसी को रास आए, यह जरूरी नहीं।

महाराष्ट्र के FDA में मंत्री नरहरी झिरवल और कमिश्नर तुकाराम मुंढे के बीच उभरा विवाद कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा कर रहा है। क्या यह वाकई मंत्री और अधिकारी के बीच व्यक्तिगत खटास है, या फिर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई और राजनीतिक-प्रशासकीय दबाव के बीच टकराव?

पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जहरीली शराब त्रासदी

इस पूरे मामले की शुरुआत मई 2026 में पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में हुई जहरीली शराब त्रासदी के बाद हुई। इस घटना में 22 लोगों की मौत के बाद FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने राज्यभर में मिथेनॉल बनाने और बेचने वाली कंपनियों की जांच के आदेश दिए।

जांच में 405 कंपनियों को नोटिस जारी हुए। 309 कंपनियों के लाइसेंस एक महीने के लिए निलंबित किए गए, जबकि 69 के लाइसेंस रद्द कर दिए गए। इसके बाद 22 कंपनियों ने मंत्री नरहरी झिरवल के पास अपील की।

अपील और कंपनियों को दी गई राहत

विवाद तब गहराया, जब रांजणगांव MIDC की एक कंपनी को राहत देते हुए नरहरी झिरवल ने मुंढे की कार्रवाई पर अस्थायी रोक लगा दी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंत्री के पास कुल 28 अपीलें आई थीं। इनमें से 27 खारिज कर दी गईं, जबकि एक कंपनी को अपना पक्ष रखने का अतिरिक्त मौका देते हुए कार्रवाई पर अस्थायी रोक दी गई। इस मामले में अगली सुनवाई 4 नवंबर को होनी है। यानी मंत्री का फैसला सभी कंपनियों को राहत देने वाला नहीं था।

अपीलीय अधिकारों को लेकर प्रशासकीय टकराव

लेकिन कहानी सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है। असली सवाल है कि कार्रवाई करने और उसके खिलाफ अपील सुनने का अधिकार किसके पास होना चाहिए? फिलहाल दवा और कॉस्मेटिक्स से जुड़े कई मामलों में मंत्री अपीलीय प्राधिकारी हैं। तुकाराम मुंढे ने सरकार को पत्र लिखकर अपीलों की सुनवाई का अधिकार कमिश्नर को सौंपने का प्रस्ताव दिया है। रिपोर्ट में 2,453 लंबित अपीलों का जिक्र है। मुंढे का तर्क बताया गया है कि सुनवाई में देरी से विभाग की कार्रवाई का असर कमजोर पड़ता है।

उधर, मुंढे की कार्यशैली को लेकर विभाग के भीतर भी असहजता की खबरें सामने आई हैं। कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करने और जल्दबाजी में कार्रवाई से बचने की सलाह दी है। कई रेस्टोरेंट ने FDA की कार्रवाई को अदालत में चुनौती भी दी है।

झिरवल को मुंढे की सख्ती पसंद नहीं?

फिलहाल इसे व्यक्तिगत दुश्मनी कहना जल्दबाजी होगी। झिरवल पहले कह चुके हैं कि कंपनियों की अपील सुनना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है और फैसला तथ्यों के आधार पर होगा। ऐसे में इस विवाद का केंद्र अधिकारों की सीमा, अपीलों का निपटारा और प्रशासनिक कार्यशैली दिखाई देता है।

अब सबकी नजर 4 नवंबर की सुनवाई और मुंढे के प्रस्ताव पर सरकार के रुख पर है। यही तय करेगा कि FDA में कर्तव्य और राजनीतिक-प्रशासकीय अधिकारों के बीच यह खींचतान किस दिशा में जाती है।

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