Legal battle Over Shiv Sena Symbol: शिवसेना पार्टी और उसके प्रसिद्ध 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न को लेकर जारी कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष शिंदे गुट की ओर से जोरदार पैरवी की गई। शिंदे गुट के वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग द्वारा दिए गए फैसलों का पूर्ण समर्थन करते हुए दावा किया कि यह फैसला पूरी तरह संवैधानिक है और इसमें संविधान के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है।
ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पहले यह तर्क दिया था कि "विधानमंडलमें फूट का मतलब राजनीतिक दल में फूट नहीं होता।" इस तर्क का करारा जवाब देते हुए नीरज किशन कौल ने कहा कि उद्धव ठाकरे ने पार्टी की मूल विचारधारा के विपरीत जाकर कांग्रेस के साथ जाने का फैसला किया था। उसी समय शिवसेना के अधिकांश विधायकों और सांसदों ने उनसे अलग रुख अपनाया। जब जनप्रतिनिधि स्वतंत्र बैठकें करते हैं, अलग प्रस्ताव पारित करते हैं और अलग रुख अपनाते हैं, तो वही पार्टी के भीतर वास्तविक राजनीतिक टूट होती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता कौल ने शिवसेना के संविधान पर भी कोर्ट के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्य रखे। उन्होंने इस दावे को खारिज किया कि 'पक्षप्रमुख' का पद 2018 में बना था, और स्पष्ट किया कि यह पद 2013 में ही अस्तित्व में आ गया था। इसके साथ ही उन्होंने अदालत को ध्यान दिलाया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग के पास पार्टी की मान्यता और चुनाव चिह्न से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने के व्यापक अधिकार प्राप्त हैं।
शिंदे गुट ने यह भी रेखांकित किया कि चुनाव आयोग के समक्ष जाने से पहले दोनों पक्षों ने अलग-अलग बैठकें की थीं, स्वतंत्र प्रस्ताव पास किए थे और एक-दूसरे के खिलाफ अयोग्यता की मांग की थी। इसलिए यह केवल विधानमंडल तक सीमित विवाद नहीं था, बल्कि पूरे राजनीतिक दल के अस्तित्व से जुड़ा मामला था। अब इस हाई-प्रोफाइल मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला क्या आता है, इस पर पूरे महाराष्ट्र के राजनीतिक हलकों की निगाहें टिकी हुई हैं।