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मुंबई

मुंबई की झोपड़पट्टियों में स्वास्थ्य अभियानों का असर, 5 साल में बच्चों का बौनापन और महिलाओं का एनीमिया घटा

Mumbai Slum Health Improvement: स्नेहा संस्था की 5 साल की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई की झोपड़पट्टियों में बच्चों में बौनापन 30% से घटकर 21% और महिलाओं में एनीमिया 40% से घटकर 17% रह गया है।

रूपम सिंह

Mumbai Slum Health Survey SNEHA: मुंबई की झोपड़पट्टियों में महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चलाए गए अभियानों का असर अब आंकड़ों में साफ दिखाई दे रहा है। स्नेहा की साल 2021-22 से 2025-26 की सर्वे रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि झोपड़पट्टियों में स्वास्थ्य का 'पंच', पांच साल में बौनापन और एनीमिया पर वार हुआ है।

पांच साल में बच्चों में बौनेपन की दर 30 फीसदी से घटकर 21 फीसदी रह गई, जबकि महिलाओं में एनीमिया का प्रमाण 40 फीसदी से घटकर 17 फीसदी पर आ गया। इसी तरह बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण भी 79 फीसदी से उछलकर 93 फीसदी तक पहुंच गया। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों में गंभीर कुपोषण की दर 14 फीसदी से घटकर 11 फीसदी हुई है। कम वजन की समस्या भी 28 फीसदी से घटकर 22 फीसदी रह गई।

बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में आने वाली बाधाओं का प्रमाण 18 फीसदी से घटकर महज 7 फीसदी रह गया। कुल मिलाकर स्वास्थ्य अभियानों का असर केवल पोषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बच्चों के समग्र विकास पर भी दिखाई दिया। महिलाओं में समय पर गर्भावस्था पंजीकरण का प्रमाण 45 से बढ़कर 76 फीसदी हो गया।

संस्थागत और सुरक्षित प्रसव में भी वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि स्थानीय नागरिकों की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और एकीकृत बाल विकास सेवा तक पहुंच और भागीदारी में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

आंगनवाड़ियों की हालत भी पलटी

'गोद ली गई आंगनवाड़ी' पहल के तहत आंगनवाड़ी केंद्रों की बुनियादी सुविधाओं - से लेकर सेवा वितरण तक में सुधार किया गया। रिपोर्ट के अनुसार मध्यम या उत्कृष्ट दर्जे वाले आंगनवाड़ी केंद्रों का प्रमाण 13 से बढ़कर 53 फीसदी हो गया। इसके उलट अत्यंत साधारण दर्जे वाले केंद्र 24 से घटकर केवल 3 फीसदी रह गए।

पका हुआ भोजन, पोषक आहार, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, बच्चों की वृद्धि की निगरानी और पोषण संबंधी सलाह को लेकर जागरूकता बढ़ी है। हालांकि, सर्वे में जागरूकता और सेवाओं के वास्तविक उपयोग के बीच अंतर भी सामने आया है। लाभार्थियों की संतुष्टि को लेकर भी अभी सुधार की गुजाइश है।

10 मनपाओं तक पहुंचा रेफरल सिस्टम

गर्भवती महिलाओं को गंभीर स्थिति में समय पर अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था ने भी लंबी छलांग लगाई है। वर्ष 2007 में एक मनपा से शुरू हुई रेफरल व्यवस्था 2025 तक 10 मनपाओं तक पहुंच गई। रेफर की गई महिला के निर्धारित अस्पताल तक पहुंचने की पुष्टि का प्रमाण 36 से बढ़कर 84 फीसदी हुआ।

रेफरल स्लिप पूरी तरह भरने का प्रमाण 78 से बढ़कर 89 फीसदी और मानक चिकित्सा नियमों के अनुसार मरीजों के स्थानांतरण का प्रमाण 76 से बढ़कर 87 फीसदी हो गया। रेफरल व्यवस्था की निगरानी और दस्तावेजीकरण पहले 'स्नेहा' संस्था करती थी। अब यह जिम्मेदारी मनपा के नोडल अधिकारियों को सौंप दी गई है।

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