Saamana Editorial Mamata Banerjee Support (फोटो क्रेडिट-X)  
मुंबई

सामना में बड़ा दावा: राष्ट्रपति अपमान के नाम पर चुनावी प्रोपगेंडा कर रही बीजेपी, बंगाल में ममता की जीत तय

Saamana Editorial Mamata Banerjee Support: शिवसेना (UBT) ने सामना में ममता बनर्जी का समर्थन करते हुए बीजेपी के राष्ट्रपति अपमान वाले दावों को चुनावी प्रोपगेंडा करार दिया है।

अनिल सिंह

Shiv Sena UBT vs BJP West Bengal Elections: शिवसेना (UBT) के मुखपत्र 'सामना' के ताजा संपादकीय में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जोरदार समर्थन करते हुए भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला गया है। लेख में दावा किया गया है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बंगाल दौरे के दौरान उठे प्रोटोकॉल विवाद को बीजेपी जानबूझकर चुनावी मुद्दा बना रही है। 'सामना' के अनुसार, अगर बीजेपी इस विषय को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भुनाने की कोशिश करती है, तो वहां ममता बनर्जी की प्रचंड और शानदार जीत सुनिश्चित है। संपादकीय में यह स्पष्ट किया गया है कि जनहित के वास्तविक मुद्दों की कमी के कारण सत्ताधारी दल इस तरह के भावनात्मक विषयों को राजनीतिक रंग दे रहा है।

संपादकीय में राष्ट्रपति के स्वागत के लिए ममता बनर्जी के न पहुंचने के पीछे के कारणों को तार्किक बताया गया है। लेख के अनुसार, ममता बनर्जी का यह गुस्सा जायज है कि राष्ट्रपति की यात्रा राज्य सरकार को विश्वास में लिए बिना तय की गई थी। जब ममता बनर्जी खुद जन आंदोलनों और धरने में व्यस्त थीं, उस समय राष्ट्रपति कोलकाता पहुंचीं। उन्होंने शहर के मेयर को स्वागत के लिए भेजकर अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। 'सामना' ने सवाल उठाया है कि अगर राष्ट्रपति साल में पचास बार किसी राज्य का दौरा करती हैं, तो क्या मुख्यमंत्री को हर बार प्रोटोकॉल के नाम पर अपने जरूरी काम छोड़कर एयरपोर्ट जाना अनिवार्य होना चाहिए?

चुनावी प्रोपगेंडा और आदिवासी अस्मिता का सवाल

बीजेपी द्वारा इस विवाद को आदिवासी महिला के अपमान से जोड़ने की कोशिशों पर 'सामना' ने कड़े सवाल खड़े किए हैं। लेख में पूछा गया है कि जब मणिपुर में आदिवासी महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाया गया और उनके साथ जघन्य अपराध हुए, तब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की कोई टिप्पणी क्यों नहीं आई? संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन के अधिकारों का सरेआम उल्लंघन हो रहा है, लेकिन इन गंभीर विषयों पर राष्ट्रपति भवन की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। केवल राजनीतिक लाभ के लिए आदिवासी अस्मिता का कार्ड खेलना राष्ट्रपति पद की गरिमा के खिलाफ है।

पुराने प्रोटोकॉल विवादों की लंबी फेहरिस्त

शिवसेना (UBT) ने केंद्र सरकार को आईना दिखाते हुए याद दिलाया कि अतीत में खुद बीजेपी ने कई बार राष्ट्रपति पद की गरिमा को दरकिनार किया है। संपादकीय में 28 मई 2023 को हुए नए संसद भवन के उद्घाटन का जिक्र किया गया, जिसमें देश के सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख यानी राष्ट्रपति को आमंत्रित नहीं किया गया था। इसी तरह अयोध्या में राम मंदिर के भव्य उद्घाटन समारोह में भी राष्ट्रपति की अनुपस्थिति को लेकर सवाल उठाए गए हैं। लेख में हरियाणा के एक कार्यक्रम का भी उदाहरण दिया गया जहां मुख्यमंत्री गायब थे, फिर भी उस समय बीजेपी ने इसे राष्ट्रपति का अपमान नहीं माना था।

राष्ट्रपति पद की गरिमा और संवैधानिक जिम्मेदारी

लेख के अंत में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और प्रणव मुखर्जी जैसे महान राष्ट्रपतियों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि राष्ट्रपति भवन की प्रतिष्ठा बनाए रखना सभी दलों की जिम्मेदारी है। 'सामना' का मानना है कि राष्ट्रपति पद को राजनीतिक विवादों और चुनावी रैलियों में घसीटना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। पश्चिम बंगाल की घटना को जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर पर तूल दिया जा रहा है, वह केवल ममता बनर्जी की बढ़ती लोकप्रियता को रोकने का एक असफल प्रयास है। संवैधानिक पदों का राजनीतिकरण करने के बजाय सरकार को जनहित के बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।

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