Rohit Pawar Demands Re Election For Rebel MPs: महाराष्ट्र में जारी ऑपरेशन टाइगर और सांसदों की संभावित बगावत के बीच, एनसीपी शरद पवार गुट के युवा नेता रोहित पवार ने एक ऐसी दलील पेश की है जिसने सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़ा कर दिया है। रोहित पवार ने देश में चल रहे NEET पेपर लीक विवाद की तुलना महाराष्ट्र की आयाराम-गयाराम की राजनीति से करते हुए नैतिकता और न्याय का सवाल उठाया है।
रोहित पवार ने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि अगर NEET जैसी परीक्षा में पेपर लीक होने पर पूरी परीक्षा रद्द कर दी जाती है और री-एग्जाम आयोजित की जाती है, तो फिर विधायकों और सांसदों की फूट के बाद री-इलेक्शन क्यों नहीं कराए जाते? उन्होंने सवाल किया कि क्या यही न्याय है कि छात्रों के लिए नियम अलग और सत्ता के गलियारों में बैठने वाले नेताओं के लिए अलग हों?
रोहित पवार ने पेपर लीक और राजनीतिक दलबदल के परिणामों के बीच एक गहरी समानता दिखाई है। उनके अनुसार, जिस प्रकार पेपर लीक होने से केवल धोखेबाजों की चांदी होती है और प्रामाणिक छात्रों पर अन्याय होता है, ठीक उसी तरह विधायकों और सांसदों की फूट से केवल उन पाला बदलने वाले नेताओं के घरों में संपत्ति और समृद्धि आती है। दूसरी ओर, जिन आम मतदाताओं ने उन्हें अपना बहुमूल्य वोट देकर चुनकर भेजा था, उन पर राजनीतिक अस्थिरता और विश्वासघात की आपदा आन पड़ती है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब शिवसेना उद्धव गुट के 6 सांसदों के पाला बदलने की अटकलें तेज हैं और उन्हें सरकार द्वारा विशेष सुरक्षा प्रदान की गई है। संजय राउत इन सांसदों को पहले ही गद्दार करार दे चुके हैं और अबू आजमी ने इसे भाजपा की दादागिरी बताया है। रोहित पवार का यह हमला इस नैरेटिव को और मजबूत करता है कि दलबदल न केवल पार्टी के साथ विश्वासघात है, बल्कि यह सीधे तौर पर जनता के जनादेश का अपमान है।
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रोहित पवार की यह मांग कि दलबदल के तुरंत बाद सांसदों को दोबारा जनता की अदालत में जाना चाहिए, महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई बहस छेड़ सकती है। एक तरफ जहां 21 जून को NEET के छात्रों के लिए 'री-एग्जाम' की तैयारी हो रही है, वहीं पवार ने राजनेताओं की नीति और नीयत पर सवाल उठाकर सरकार को असहज कर दिया है। क्या वाकई राजनीति में भी वही 'री-इलेक्शन' का न्याय लागू होगा जो छात्रों की परीक्षा में होता है? यह सवाल अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है।