मुंबई लोकल में प्रतिदिन लगभग 75 से 80 लाख लोग सफर करते हैं।
ओवरहेड वायर में गड़बड़ी और सिग्नल रिले रूम में आग से 80 सेवाएं रद्द हुईं।
पटरियों पर चलने को मजबूर यात्रियों में से 3 लोगों की जान गई।
सीएसएमटी से दादर तक 5वीं-6ठी लाइन का अधूरा काम
15 डिब्बों की ट्रेनों की कमी और मोटरमैन के खाली पदों से पंक्चुअलिटी लगातार गिर रही है।
Mumbai Local Train Infrastructure Issues: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की लाइफलाइन कही जाने लोकल ट्रेनों की लड़खड़ाती गति ने मुंबईकरों की परेशानी बढ़ा दी है। हर सुबह लाखों लोग इसी भरोसे घर से निकलते हैं कि मुम्बई लोकल उन्हें समय पर दफ्तर, कारोबार और कामकाज की जगह तक पहुंचा देगी। लेकिन जब यही धड़कन बार-बार तकनीकी खराबियों, सिग्नल फेलियर, ओवरहेड वायर में गड़बड़ी और संचालन में लेटलतीफी से थमने लगती है, तो यात्रियों की दिनचर्या ही नहीं बल्कि सुरक्षा और आजीविका भी दांव पर लग जाती है।
सवाल है कि आखिर मुंबई की लोकल बार-बार क्यों लड़खड़ाती है और हर व्यवधान के बाद स्थायी समाधान क्यों नजर नहीं आता? चाहे मानसून हो या ठंडी या गर्मी का मौसम किसी न किसी कारण से मुंबई लोकल की स्पीड थम जाती है।
सोमवार को तो मुलुंड-ठाणे के बीच ओवरहेड उपकरण में बाहरी तार फंसने और कांजुरमार्ग में सिग्नलिंग रिले रूम में आग लगने की घटना के बाद अप व डाउन दोनों मार्ग पर लोकल सेवा ठप हो गई। 80 लोकल सेवाएं रद्द करनी पड़ीं, जबकि लगातार 10 घंटों तक यात्रियों को जूझना पड़ा। हजारों की संख्या में यात्री ट्रेनों से उतरकर पटरियों पर चलते दिखाई दिए। इस दौरान हुई घटनाओं में 3 यात्रियों की जान भी चली गई।
पिछले कुछ दिनों से अक्टूबर हीट का भी असर पटरियों पर पड़ने से लोकल सेवा लड़खड़ाती रही है। मानसून के दौरान तो मुंबई में पटरियों पर पानी भरने से भी लोकल ठप हो जाती है।
यह सही है कि मुंबई की उपनगरीय रेल व्यवस्था पर यात्रियों का भारी दबाव है। मुंबई लोकल से रोजाना 75 से 80 लाख लोग यात्रा करते हैं। मध्य व पश्चिम रेलवे के माध्यम से रोजाना 3200 से ज्यादा लोकल फेरियां भी होती हैं। ऐसे में सिग्नल प्रणाली में छोटी सी भी खराबी या किसी एक ट्रेन के रुकने का असर कई दूसरी सेवाओं पर पड़ता है।
मुंबई लोकल में चंद मिनटों की देरी धीरे-धीरे लंबी कतारों, प्लेटफॉर्म पर बढ़ती भीड़ और ट्रेनों में खचाखच हालात में तब्दील हो जाती है। नौकरीपेशा लोगों की हाजिरी, विद्यार्थियों की पढ़ाई, मरीजों की अस्पताल तक पहुंच और छोटे कारोबारियों की कमाई, सब इस अव्यवस्था की कीमत चुकाते हैं।
बिजली आपूर्ति से जुड़ी खराबियां, ओवरहेड वायर में गड़बड़ी और पटरियों की कमी और रखरखाव की चुनौतियां भी मुंबई में रेल संचालन को प्रभावित कर रही हैं। दशकों बाद भी मध्य रेल के सीएसएमटी मुंबई से दादर तक 5 वीं 6 ठी लाइन का काम नहीं हो पाया है।
इसी तरह ठाणे से कल्याण तक 5 वीं 6 ठी लाइन बनी लेकिन लोकल ट्रेन सेवा में बढ़ोतरी न होने से भीड़ बरकरार है। इसी तरह मध्य रेल के फास्ट लाइन पर 15 डिब्बा लोकल सेवा के न बढ़ने से भी भारी भीड़ का आलम रहता है। सुबह समय पर शुरू होने वाली लोकल दोपहर तक हांफने लगती है।
मोटरमैन सहित परिचालन कर्मचारियों की उपलब्धता, ड्यूटी का दबाव और पर्याप्त विश्राम भी सुरक्षित तथा समयबद्ध संचालन के महत्वपूर्ण पहलू हैं। मध्य व पश्चिम रेलवे पर लोकल संचालन के लिए आवश्यक स्टाफ की कमी भी बताई जाती है,इसका असर पंक्चुअलिटी पर भी पड़ता है। लोकल ट्रेनें देरी से चलने के कारण यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मुंबईकरों के लिए लोकल ट्रेन सेवा का रुकना महज परिवहन में देरी नहीं, बल्कि पूरे दिन का गणित बिगड़ जाना है। भीड़ के दबाव में ट्रेन पकड़ने की होड़ और प्लेटफॉर्म पर अफरातफरी से जोखिम भी बढ़ती है। इसलिए समय-सारिणी सुधारने के साथ भीड़ प्रबंधन, नियमित तकनीकी निरीक्षण, समयबद्ध रखरखाव और आपात स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था की भी मांग की जाती रही है।
मुंबई के लाखों लोकल यात्रियों को रियल-टाइम सूचना के साथ आरामदायक यात्रा विकल्प उपलब्ध कराने में महाराष्ट्र सरकार असफल रही है।