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मुंबई

दीपावली पर मुंबई के ऐतिहासिक कुम्हारवाड़ा की चमक बढ़ी विदेशों तक मिट्टी के दीयों की मांग, कारीगर संकट में

Mumbai Diwali Festival: दिवाली पर मुंबई के कुम्हारवाड़ा में मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ी। अमेरिका व सिंगापुर तक निर्यात होने के बावजूद बढ़ती लागत व जगह की कमी से कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट।

रूपम सिंह

Highlights

  • मुंबई के कुम्हारवाड़ा के मिट्टी के दीयों की विदेशों तक मांग।

  • चार पीढ़ियों से कुम्हार परिवार संभाल रहे पुश्तैनी कारोबार।

  • बढ़ती लागत और मजदूरों की कमी से पारंपरिक कारीगरी पर संकट।

Mumbai Dharavi Kumbharwada Diwali Diyas: दीपावली का त्योहार आते ही कुम्हारवाड़ा में मिट्टी के दीयों और बर्तनों की मांग में अचानक बढ़ोतरी हो जाती है। आधुनिक दौर में जहां लोग सजावटी और चाइनीज लाइटों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं पारंपरिक मिट्टी के दीपकों का आकर्षण और धार्मिक महत्व आज भी पूरी तरह बरकरार है। मुंबई के इस ऐतिहासिक इलाके में कुम्हार परिवार पीढ़ियों से अपनी इस कला और परंपरा को बहुत ही शिद्दत के साथ आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं।

कुम्हारवाड़ा के दीयों की विदेशों तक मांग है। कुम्हारवाड़ा में चार पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तनों का कारोबार संभाल रहे हुसैन इब्राहिम बागड़िया बताते हैं कि उनका परिवार वर्ष 1980 से इस पुश्तैनी व्यवसाय से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि समय के साथ इस कारोबार में काफी बदलाव आए हैं। पहले जहां चाक पर हाथों से तैयार किए गए केवल साधारण और एक जैसे दीये ही बाजार में बिकने के लिए आते थे।

मिट्टी से बने खिलौनों और कलश की मांग भी बढ़ी

नवरात्रि और दीपावली त्योहार में मिट्टी से बने पारंपरिक खिलौनों और कलश की मांग भी बढ़ जाती है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटी रमनिया पिछले 30 वर्षों से मिट्टी के आकर्षक खिलौने और पूजा के लिए कलश तैयार कर रही है।

वह अपने हाथों से मिट्टी को अलग-अलग आकार देकर बच्चों के लिए सुंदर खिलौने और दीपावली पूजन के लिए कलश बनाती है। उन्होंने बताया कि वह पिछले तीन दशकों से दीपावली के अवसर पर मिट्टी के उत्पाद तैयार कर रही है। इन खिलौनों और कलश को बनाने में काफी मेहनत, समय और हुनर की जरूरत होती है।

रोजगार का संकट और नई पीढ़ी की दूरी

59 वर्षीय बागड़िया ने बताया कि इस पारंपरिक कारोबार से कुम्हारवाडा में सीधे तौर पर 100 से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। इस व्यवसाय में कुम्हार समाज के गुजराती, काठियावाड़ी और कच्छी परिवार पिछले करीब 125 से 150 वर्षों से काम करते आ रहे हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश से आए कई मेहनती मजदूर भी मिट्टी तैयार करने और बर्तनों को पकाने जैसे कठिन कार्यों में पूरा सहयोग करते हैं।

हालांकि, इस क्षेत्र से जुड़े कारीगरों के सामने आज रोजी-रोटी का एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है। बागड़िया बताते हैं कि उनके परिवार की यह चौथी पीढ़ी है, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को इस काम में बिल्कुल नहीं लगाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह इस व्यवसाय में लगातार बढ़ती लागत, काम करने के लिए पर्याप्त जगह की भारी कमी और कुशल मजदूरों का अभाव है।

वैश्विक बाजार तक पहुंची स्थानीय कारीगरी का सफर

कारोबारियों के मुताबिक, कुम्हारवाड़ा में तैयार होने वाले मिट्टी के उत्पादों की ख्याति अब केवल मुंबई शहर या देश के अन्य महानगरों तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इनका निर्यात अमेरिका, हांगकांग, बैंकॉक और सिंगापुर जैसे विकसित देशों के विदेशी बाजारों में भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

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