धनतेरस 6 नवंबर को, सोना-चांदी खरीदने के मिल रहे हैं 4 शुभ मुहूर्त; जानें पूजा का सबसे उत्तम समय

Dhanteras Shopping Muhurat: सनातन संस्कृति में दिवाली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत 6 नवंबर को धनतेरस से होगी। जानिए सोना-चांदी खरीदने के चार शुभ मुहूर्त और प्रदोष काल में पूजा का समय।
Dhanteras will be celebrated on November 6; there are four auspicious times for purchasing gold and silver
सोने-चांदी खरीदारीसोर्स- सोशल मीडिया
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Highlights

  • धनतेरस 6 नवंबर को मनाई जाएगी, सोना-चांदी खरीदने के चार शुभ मुहूर्त।

  • शाम 6:03 से रात 8:35 बजे तक लक्ष्मी-कुबेर पूजा का उत्तम समय।

  • नरक चतुर्दशी पर यमदीप और पितरों के निमित्त दीपदान की परंपरा।

Diwali Festival Maharashtra: सनातन संस्कृति में दीपावली का पांच दिवसीय पावन पर्व सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा और सदाचार के उजियारे का जीवंत प्रतीक है। इस पवित्र पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है, जो इस वर्ष छह नवंबर को श्रद्धा के साथ मनाई जाएगी। इस शुभ दिन मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर के आशीर्वाद की कामना के साथ सोना, चांदी, नए बर्तन और आभूषण खरीदना बेहद मंगलकारी माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि इस दिन की गई खरीदारी घर में सुख-समृद्धि और बरकत लेकर आती है। यही कारण है कि बाजारों में उत्सव जैसा उत्साह छा जाता है और हर घर में बरकत की उम्मीद जग जाती है।

पूजा और अनुष्ठान के लिए उपयुक्त समय

धनतेरस का यह पर्व केवल भौतिक वस्तुओं की खरीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतःकरण को पवित्र करने और आभार व्यक्त करने का अवसर है। इस दिन संध्याकाल में मां लक्ष्मी, धन के अधिपति भगवान कुबेर और आयुर्वेद के प्रणेता भगवान धन्वंतरि की उपासना की जाती है। प्रदोष काल के दौरान पूजा करना सबसे अधिक फलदायी माना गया है।

सोना-चांदी खरीदने के चार शुभ मुहूर्त

  • आचार्य बालकृष्ण मिश्र के अनुसार, 6 नवंबर को खरीदारी के लिए चार विशेष मुहूर्त रहेंगे।

  • पहला मुहूर्त: सुबह 10:30 बजे से 10:53 बजे तक अमृत चौघड़िया।

  • दूसरा मुहूर्त: दोपहर 12:18 बजे से 1:43 बजे तक शुभ चौघड़िया।

  • तीसरा मुहूर्त: शाम 4:34 बजे से 6 बजे तक।

  • चौथा मुहूर्त: रात 9:09 बजे से 10:44 बजे तक।

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पूर्वजों और पितरों के निमित्त दीपदान

आचार्य ने बताया कि दीपावली त्योहार से ठीक एक दिन पूर्व आने वाली नरक चतुर्दशी अज्ञान और अंधकार से मुक्ति का संदेश देती है। भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध हमें बुराई पर अच्छाई की शाश्वत जीत की प्रेरणा देता है। संध्या के समय अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति पाने और परिवार की रक्षा के लिए यमराज के निमित्त चौमुखी दीपक जलाया जाता है।

इसके साथ ही, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दिवंगत पूर्वजों और पितरों के निमित्त दीपदान भी किया जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि हम अपने पुरखों को नमन करते हैं, जिससे समस्त पितृ दोष शांत होते हैं और उनका असीम आशीर्वाद हमारी पूरी पीढ़ी पर सदैव बना रहता है। यह पर्व जीवन में प्रकाश, कृतज्ञता और संस्कारों की अमिट छाप छोड़ जाता है।

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वृषभ और प्रदोष काल

पंचांग के मुताबिक इस वर्ष पूजा के लिए शाम 6 बजकर 03 मिनट से रात 8 बजकर 35 मिनट तक का समय सबसे उत्तम रहेगा। यह पवित्र अवधि वृषभ काल और प्रदोष काल के मिलन का सुअवसर है, जिसमें सच्चे मन से की गई प्रार्थना सीधे ईश्वर तक पहुंचती है और घर में स्थायी शांति व वैभव का वास होता है।