गड़तिरोली के किसानें को जमीन और फसल दोनों बचाने की चुनौती (सोर्स: AI)
गढचिरोली

खेत उजाड़ रहे हाथी, जमीन छीन रही परियोजनाएं; पहले फसल बचाएं या जमीन? दोहरी संकट में गड़चिरोली का अन्नदाता

Farmers Land Acquisition Protest: गड़चिरोली में किसान हाथियों से फसल बचाने और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं। आष्टी चक्काजाम के बाद सरकार से संवाद और न्याय की मांग तेज हुई।

आलोक उमाकृष्ण

Gadchiroli Farmers Land Acquisition Protest: गड़चिरोली जिले का किसान इन दिनों अभूतपूर्व दोहरे संकट से गुजर रहा है। एक ओर जंगली हाथियों के झुंड धान की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं, तो दूसरी ओर हवाई अड्डे तथा प्रस्तावित लौह परियोजनाओं के लिए चल रही भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया किसानों के लिए मानसिक, आर्थिक और सामाजिक तनाव का कारण बन गई है।

स्थिति यह है कि खेती के मौसम में किसान खेतों में काम करने के बजाय अपनी जमीन बचाने के लिए मोर्चे, चक्का जाम और आंदोलन करने को मजबूर हैं। इससे सरकार की नीतियों पर गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। हवाई अड्डे तथा औद्योगिक परियोजनाओं के लिए किसानों को नोटिस जारी किए गए हैं।

दो माह बाद फिर शुरू हुई प्रक्रिया

करीब 2 माह पहले कई गांवों के किसान अपने परिवारों सहित जिला कलेक्ट्रेट के सामने चार दिनों तक धरने पर बैठे थे। आंदोलन को देखते हुए सरकार ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को कुछ समय के लिए स्थगित किया था। लेकिन अब प्रक्रिया फिर शुरू होने से किसानों में असंतोष और अविश्वास बढ़ गया है। किसान नेताओं का कहना है कि मुदत बढ़ाना समाधान नहीं है। सरकार को संवाद कर विकल्प तलाशने चाहिए थे।

दूसरी ओर हाथियों का कहर

भूमि अधिग्रहण के तनाव के बीच जिले के कई हिस्सों में जंगली हाथियों ने धान की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। रात भर खेतों की रखवाली करना, परिवार के साथ भय के माहौल में रहना और मेहनत से तैयार फसल का एक ही रात में नष्ट हो जाना किसानों को निराश और असहाय बना रहा है। एक ओर जमीन बचाने के लिए सरकार से संघर्ष, दूसरी ओर फसल बचाने के लिए हाथियों से जूझना किसान दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहा है।

सरकार संवाद का रास्ता अपनाए

वर्तमान परिस्थितियों से गड़चिरोली प्रशासन और किसानों के बीच विश्वास का संकट साफ दिखाई देता है। धरना, चक्का जाम और बढ़ता आक्रोश केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि संवाद की विफलता के संकेत हैं। सरकार को केवल नोटिस जारी करने तक सीमित न रहकर गांव-गांव जाकर किसानों से बातचीत करनी चाहिए, उनकी आपत्तियों को सुनना चाहिए और विकल्पों पर खुली चर्चा करनी चाहिए।

किसानों का कहना है कि उन्होंने कई बार सुझाव दिया कि परियोजनाओं के लिए उपजाऊ कृषि भूमि के बजाय झाड़ीदार जंगल, बंजर या कम उपजाऊ जमीन का उपयोग किया जाए, इसके बावजूद उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा और अधिग्रहण प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। किसानों के अनुसार, जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि हमारे जीवन, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का आधार है। इसलिए यह मुद्दा केवल मुआवजे तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि अस्तित्व के संघर्ष में बदल गया है।

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