Sambhajinagar Ganesh Sangh Completes 101 Years: छत्रपति संभाजीनगर शहर में सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा इस वर्ष एक ऐतिहासिक पड़ाव पर पहुंच गई है। गणेश मंडलों को संगठित करने के उद्देश्य से वर्ष 1924 में स्थापित गणेश संघ ने 101 वर्ष पूरे कर लिए हैं। एक सदी से अधिक की इस यात्रा में गणेश संघ का स्वरूप भी बदलता गया और वर्ष 1966 में इसे जिलास्तरीय गणेश महासंघ का रूप दिया गया।
आज यह महासंघ केवल गणेशोत्सव के आयोजन और मंडलों के बीच समन्वय तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और जनजागरूकता से जुड़े कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। महासंघ की जिम्मेदारी पिछले 46 वर्षों से अधिक समय से पृथ्वीराज पवार संभाल रहे हैं।
छत्रपति संभाजीनगर में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत वर्ष 1899 में हुई थी। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू की गई सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा से प्रेरणा लेकर तत्कालीन औरंगाबाद के राजाबाजार क्षेत्र में पहला सार्वजनिक गणेशभक्त भजन मंडल स्थापित किया गया था। इसके बाद शहर के विभिन्न हिस्सों में सार्वजनिक गणेश मंडल अस्तित्व में आने लगे।
समय के साथ मंडलों की संख्या बढ़ती गई और उनके माध्यम से धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियां भी होने लगीं। मंडलों के बीच समन्वय और संगठन की जरूरत महसूस होने लगी। इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1924 में गणेश संघ की स्थापना की गई।
गणेश संघ की स्थापना को 101 वर्ष पूरे होना शहर के सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। संगठन की यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 1966 रहा। इसी दौरान गणेश संघ का स्वरूप बदलकर जिलास्तरीय गणेश महासंघ के रूप में विकसित हुआ।
महासंघ के माध्यम से शहर और जिले के विभिन्न गणेश मंडलों को एक मंच पर लाने, उनके बीच समन्वय स्थापित करने और गणेशोत्सव को अधिक अनुशासित तथा व्यवस्थित तरीके से आयोजित करने पर जोर दिया गया। जिले के स्तर पर गणेश मंडलों को संगठित करने वाली संस्था के रूप में महासंघ की अलग पहचान बनी।
गणेश महासंघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में पृथ्वीराज पवार का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह 46 वर्षों से अधिक समय से महासंघ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। लंबे समय तक संगठन का नेतृत्व करने के दौरान उन्होंने अनुशासन, संगठनात्मक एकरूपता और सामाजिक सहभागिता पर जोर दिया।
महासंघ के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप को दूर रखने की नीति भी लंबे समय से दिखाई देती रही है। संगठन को किसी राजनीतिक दल से जोड़ने के बजाय सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था के रूप में उसकी पहचान कायम रखने का प्रयास किया गया।
गणेश महासंघ की कार्यप्रणाली की एक खासियत यह रही है कि इसे राजनीतिक मंच बनने से दूर रखा गया। विभिन्न विचारधाराओं और सामाजिक वर्गों से जुड़े गणेश मंडलों को एक साथ लेकर चलने की कोशिश की गई। इसके चलते महासंघ की गतिविधियों में संगठनात्मक अनुशासन और सामाजिक एकता को महत्व मिला।
गणेशोत्सव के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट करने और सार्वजनिक सहभागिता बढ़ाने की परंपरा भी आगे बढ़ती रही। कई मंडलों के कार्यकर्ताओं ने बाद में सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
महासंघ की गतिविधियां केवल गणेश स्थापना, विसर्जन और मंडलों के समन्वय तक सीमित नहीं रही हैं। समय-समय पर वृक्षारोपण, स्वास्थ्य शिविर और जनजागरूकता से जुड़े विभिन्न समाजोपयोगी उपक्रम आयोजित किए जाते हैं।
गणेशोत्सव के बड़े सार्वजनिक मंच का इस्तेमाल पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य जागरूकता और सामाजिक जिम्मेदारी के संदेश लोगों तक पहुंचाने के लिए भी किया जाता रहा है। इससे उत्सव को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की कोशिश हुई है।
101 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका गणेश महासंघ अब दूसरे शतक में प्रवेश कर चुका है। 1899 में शुरू हुई सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा, 1924 में गठित गणेश संघ और 1966 में विकसित जिलास्तरीय महासंघ का स्वरूप इस ऐतिहासिक यात्रा के प्रमुख पड़ाव रहे हैं।
बदलते समय के साथ गणेशोत्सव का स्वरूप भी बदला है। तकनीक और आधुनिक आयोजन के दौर में मंडलों की गतिविधियां बढ़ी हैं, लेकिन सामाजिक एकता, जनसहभागिता और समाजोपयोगी कार्यों की मूल भावना आज भी कायम है। 101 साल की विरासत के साथ गणेश महासंघ अब दूसरे शतक में प्रवेश कर चुका है और शहर की सार्वजनिक गणेशोत्सव परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उसके सामने है।