महाराष्ट्र के छोटे शहरों में पानी की भयंकर किल्लत और प्रशासनिक लापरवाही उजागर हुई
जर्जर पाइपलाइनों और भारी लीकेज के कारण प्रतिदिन लाखों लीटर पानी बर्बाद हो रहा है
बोरवेल सूखने से नागरिकों को महंगे निजी टैंकरों पर मजबूरन निर्भर रहना पड़ रहा है
Maharashtra Water Crisis 2026: महाराष्ट्र में जल संकट की चर्चा अक्सर मुंबई और पुणे जैसे महानगरों तक सीमित रह जाती है, लेकिन वर्ष 2026 की स्थिति पर नज़र डालें तो राज्य के छोटे व मझोले शहरों में स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी है।
कोल्हापुर, छत्रपति संभाजीनगर और सोलापुर जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में पीने के पानी की भारी किल्लत, पुरानी पाइपलाइनों से पानी की बर्बादी, प्रशासनिक ढिलाई और टैंकर माफिया के बढ़ते प्रभाव ने आम नागरिकों का जीना दुश्वार कर दिया है।
मराठवाड़ा का छत्रपति संभाजीनगर राज्य का सबसे अधिक जल-संकटग्रस्त क्षेत्र बना हुआ है, जहाँ औसतन 3,137 गांव सालाना पानी की भीषण किल्लत झेलते हैं और टैंकरों पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं।
जायकवाड़ी बांध से शहर तक पानी लाने के लिए 2,740 करोड़ रुपये की विशाल जल आपूर्ति योजना पर काम चल रहा है। बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने इस परियोजना में हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जताते हुए टिप्पणी की कि शहरवासी 'अकथनीय कष्ट' सह रहे हैं। गर्मियों में नागरिकों को 8 से 9 दिनों में केवल एक बार और बारिश तथा सर्दियों के मौसम में 6 दिनों में एक बार पानी मिल पा रहा है।
महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण (MJP) और NHAI के बीच समन्वय की कमी के कारण पाइपलाइन सड़क के बीचों-बीच बिछा दी गई, जिससे पाइप फटने पर सड़क और यात्रियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया है। पाइपलाइन बिछाने के दौरान पुरानी और नई 900 मिमी की पाइपलाइन साल भर में 54 बार फटी।
सतारा-देवलाई जैसे बिना नेटवर्क वाले इलाकों में स्थानीय बोरवेल पूरी तरह सूख जाने के बाद नागरिकों ने निर्माणाधीन पानी की टंकियों पर चढ़कर विरोध प्रदर्शन किया। यहाँ निजी टैंकर चालक प्रति ट्रिप 800 से 1,000 रुपये तक वसूल रहे हैं और नगर निगम को टैंकर से प्रति व्यक्ति केवल 20 लीटर पानी की राशनिंग करनी पड़ रही है।
सोलापुर जिले में जो जल संकट हर साल अप्रैल या मई में शुरू होता था, वर्ष 2026 में उसकी आहट अक्टूबर के महीने में ही देखने को मिली।
मानसून की बेवफाई के कारण शहर में भूजल स्तर तेज़ी से गिरा है। सोलापुर नगर निगम के कुल 5,518 बोरवेल में से 1,600 बोरवेल (लगभग 29%) अक्टूबर में ही बंद व कोरडे हो गए, जिससे शहर के कम से कम 10,000 परिवारों की दैनिक जलापूर्ति प्रभावित हुई है।
सोलापुर के 11 तालुकों के 165 गांवों और 853 बस्तियों में जल संकट गहरा चुका है, जहाँ 3.37 लाख से अधिक निवासियों और करीब 99,000 मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए प्रशासन को 178 टैंकर चलाने पड़ रहे हैं। अकेले मंगलवेढा तालुका में 45 टैंकर और सांगोला में 39 टैंकर तैनात हैं। स्थिति पर काबू पाने के लिए जिला प्रशासन को 44 कुओं और 26 बोरवेल समेत कुल 70 निजी जल स्रोतों को अपने नियंत्रण में लेना पड़ा है।
नदियों से घिरे कोल्हापुर शहर को पंचगंगा नदी, भोगावती नदी और कलांभा झील से भरपूर कच्चा पानी मिलता है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर की बदहाली के कारण शहर पानी की बूंद-बूंद को तरस रहा है।
शहर के जल शोधन संयंत्रों तक पहुंचने से पहले ही पुरानी पाइपलाइनों, लीकेज और चोरी के कारण प्रतिदिन 43.21 MLD पानी बर्बाद हो जाता है। कोल्हापुर में गैर-राजस्व पानी का स्तर 38% तक पहुँच चुका है, जो राष्ट्रीय मानक (20%) से बहुत अधिक है।
कलम्मावाड़ी सीधी पाइपलाइन योजना का काम पुईखड़ी और ठीकपुर्ली गांव में किसानों के विरोध और लीकेज के कारण बाधित रहा। इसके चलते फुलेवाड़ी, शनिवाड़ पेठ और आपटे नगर जैसे इलाकों में नियमित जल आपूर्ति ठप हो गई और नागरिकों को महंगे निजी टैंकर खरीदने पड़ रहे हैं।
शहरी सीमाओं से सटे औद्योगिक और आवासीय क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर की अनदेखी का फायदा जल माफिया उठा रहे हैं। डोंबिवली के काटई-बदलापूर महामार्ग पर MIDC की मुख्य पेयजल पाइपलाइन में कटर से छेद करके 47 अवैध चोरी के कनेक्शन चलाए जा रहे थे, जिनसे लाखों लीटर पानी चुराकर टैंकरों के जरिए बेचा जा रहा था।
एक तरफ आम जनता 36-36 घंटे का शटडाउन सह रही है और MIDC दफ्तरों का घेराव कर 'आक्रोश मोर्चा' निकाल रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे से मुख्य पाइपलाइन से पानी चुराया जा रहा था।
वर्ष 2026 की यह स्थिति स्पष्ट करती है कि महाराष्ट्र के इन उभरते शहरों में समस्या पानी की कमी से ज्यादा प्रशासनिक कुप्रबंधन, सड़क व सीवर के अधूरे निर्माण, लीकेज और जर्जर पाइपलाइनों की है।
संकट से उबरने के लिए समयबद्ध तरीके से वाटर ऑडिट करना, अवैध कनेक्शनों पर नकेल कसना और कोल्हापुर जैसे शहरों के लिए अध्ययन किए जा रहे IoT व AI (LSTM मॉडल) आधारित मांग पूर्वानुमान सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों को धरातल पर उतारना बेहद जरूरी है।