सांकेतिक फोटो (सोर्स: एआई फोटो) 
औरंगाबाद

पेट्रोल पंपों के बाहर लंबी कतारों में खड़ा किसान; मराठवाड़ा में ईंधन का अकाल या कृत्रिम किल्लत? जानें पूरा सच

मराठवाड़ा में खरीफ सीजन से पहले गहराया Fuel Crisis! बीड में पेट्रोल पंपों पर झड़प और संभाजीनगर में जमाखोरी का पर्दाफाश। जानें क्या यह वाकई डीजल की कमी है या पंप मालिकों द्वारा निर्मित कृत्रिम किल्लत?

गोरक्ष पोफली

Marathwada Fuel Crisis: मराठवाड़ा क्षेत्र, जो अपनी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है, इस समय एक गंभीर और तनावपूर्ण ईंधन संकट के मुहाने पर खड़ा है। प्रधानमंत्री के ईंधन बचत के आह्वान ने मराठवाड़ा की धरती पर एक ऐसी पैनिक लहर पैदा कर दी है, जिसने सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। खरीफ की बुवाई की दहलीज पर खड़ा किसान आज खेतों में पसीना बहाने के बजाय पेट्रोल पंपों पर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा है। आलम यह है कि बीड के पेट्रोल पंपों पर डीजल के लिए लोग एक-दूसरे पर प्लास्टिक की कैन से हमला कर रहे हैं, जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में ईंधन का अकाल है, या फिर आपदा को अवसर में बदलने वाले सिस्टम और जमाखोरों द्वारा रचा गया एक कृत्रिम संकट?

बुवाई का समय और डीजल की जंग

मराठवाड़ा के 8 जिलों (छत्रपति संभाजीनगर, जालना, बीड, धाराशिव, नांदेड़, लातूर, परभणी, हिंगोली) में खरीफ की फसलों की तैयारी जोरों पर है। जून-जुलाई में मानसून के साथ बुवाई शुरू होनी है, जिसके लिए ट्रैक्टरों और कृषि उपकरणों को भारी मात्रा में डीजल की आवश्यकता है। मराठवाडा क्षेत्र की 65-70% आबादी खेती पर निर्भर है। किसानों को डर है कि यदि समय पर डीजल नहीं मिला, तो उनके पूरे साल की कमाई यानी खरीफ की फसल बर्बाद हो जाएगी।

पैनिक बाइंग या प्रशासन की विफलता?

मराठवाडा क्षेत्र के हर जिले में आपूर्ति अधिकारियों का दावा है कि बाजार में ईंधन की कोई वास्तविक कमी नहीं है। उनके अनुसार

  • लोग डर के कारण (Panic) जरूरत से ज्यादा ईंधन का संचय कर रहे हैं।
  • स्टॉक खत्म होने का मुख्य कारण अचानक बढ़ी हुई मांग है।
  • प्रशासन नागरिकों से संयम बरतने की अपील कर रहा है।

पंप मालिकों की कालाबजारी का सच

जहाँ प्रशासन पैनिक बाइंग को जिम्मेदार ठहरा रहा है, वहीं छत्रपति संभाजीनगर के पालक मंत्री संजय शिरसाट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। एक पेट्रोल पंप पर जब किसानों को डीजल देने से मना किया गया, तो मंत्री ने खुद वहां धमक दी। पेट्रोल पंप मालिक ने दावा किया था कि स्टॉक खत्म है। लेकिन जांच में पाया गया कि पंप के पास 3,000 लीटर से ज्यादा डीजल का स्टॉक मौजूद था। मंत्री के पहुंचते ही कर्मचारी भाग खड़े हुए। प्रशासन के हस्तक्षेप के आधे घंटे के भीतर डीजल का वितरण शुरू हुआ। यह घटना संकेत देती है कि संकट का एक बड़ा हिस्सा मानव निर्मित (Artificial Shortage) हो सकता है।

संकट वास्तविक है या कृत्रिम?

मराठवाड़ा में फिलहाल दो स्थितियां एक साथ काम कर रही हैं। एक तरफ आपूर्ति को लेकर किसानों की जायज चिंता है, तो दूसरी तरफ कुछ पेट्रोल पंप मालिकों द्वारा अधिक मुनाफे के लिए की जा रही जमाखोरी। सरकार का स्पष्ट कहना है कि स्टॉक पर्याप्त है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि किसान कतारों में खड़ा है और तनाव के कारण हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं।

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