श्रावण बाल योजना (सोर्स: सोशल मीडिया) 
औरंगाबाद

Chhatrapati Sambhajinagar: 3000 बुजुर्गों की पेंशन एक साल से अटकी, प्रशासनिक सुस्ती से निराधार परेशान

Chhatrapati Sambhajinagar News: छत्रपति संभाजीनगर में नायब तहसीलदार की स्थायी नियुक्ति न होने और अधिकारियों की उदासीनता के कारण निराधार बुजुर्ग आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं, पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

गोरक्ष पोफली

Chhatrapati Sambhajinagar Pension News: छत्रपति संभाजीनगर शहर में प्रशासनिक सुस्ती के कारण समाज का सबसे कमजोर वर्ग यानी निराधार बुजुर्ग दर-दर भटकने को मजबूर हैं। शहर के करीब तीन हजार वरिष्ठ नागरिकों के पेंशन प्रस्ताव पिछले एक साल से फाइलों के ढेर में दबे हुए हैं, जिस पर अपर तहसील के संजय गांधी निराधार योजना कार्यालय ने अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। यह स्थिति उन बुजुर्गों के लिए कष्टदायक बन गई है, जो अपनी दवा और भोजन के लिए सरकारी सहायता की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

तीन हजार नए प्रस्तावों पर जम रही धूल

राज्य सरकार की श्रावण बाल सेवा राज्य निवृत्ति वेतन योजना 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के निराधार नागरिकों के लिए बनाई गई है। इसके तहत गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले या 21 हजार रुपये से कम वार्षिक आय वाले लाभार्थियों को प्रतिमाह 1500 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। विडंबना यह है कि प्रशासन की कछुआ गति के कारण वर्ष 2025 के लगभग तीन हजार नए प्रस्तावों पर धूल जम रही है। उपविभागीय अधिकारी कार्यालय परिसर में स्थित इस विभाग में पहले भी हजारों फाइलें लंबित थीं, और हालांकि उनमें से कुछ का निपटारा हुआ, लेकिन नई फाइलों पर काम अब भी अटका हुआ है।

स्थायी अधिकारी की नियुक्ति नहीं

इस पूरी समस्या की जड़ में प्रशासनिक अव्यवस्था और रिक्त पदों का मुद्दा सबसे प्रमुख है। विभाग में नायब तहसीलदार का पद सृजित होने के बावजूद लंबे समय से यहाँ किसी स्थायी अधिकारी की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। शासन द्वारा समय-समय पर अधिकारियों के तबादले तो किए गए, लेकिन इस पद की गंभीरता को समझते हुए किसी ने कार्यभार संभालने में रुचि नहीं दिखाई। कई अधिकारियों ने तबादला होने के बावजूद पदभार ग्रहण नहीं किया, तो कुछ ऐसे भी रहे जिन्होंने पदभार संभालने के तुरंत बाद लंबी छुट्टियां ले लीं।

तीन हजार बुजुर्गों का संघर्ष

अधिकारियों की इस खींचतान और गैर-जिम्मेदाराना रवैये का सीधा असर उन फाइलों पर पड़ा है जिन्हें मंजूरी के लिए केवल एक हस्ताक्षर का इंतजार है। प्रशासन की इस लापरवाही ने बुजुर्गों के मन में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। जब तक रिक्त पदों पर स्थायी नियुक्तियां नहीं होतीं और लंबित फाइलों के निपटारे के लिए कोई विशेष अभियान नहीं चलाया जाता, तब तक इन तीन हजार बुजुर्गों का संघर्ष जारी रहेगा। स्थानीय नागरिकों की मांग है कि वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करें ताकि बुजुर्गों को उनका हक मिल सके।

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