Ujjwala Yojana (सोर्सः फाइल फोटो-सोशल मीडिया) 
अकोला

उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों पर बढ़ा बोझ, अनुदानित सिलेंडरों की संख्या घटने से चिंता

LPG Subsidy Cut: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत अनुदानित गैस सिलेंडरों की संख्या 12 से घटाकर 4 किए जाने से लाभार्थियों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है। रसोई गैस की बढ़ती कीमतों और कम हुई।

महाराष्ट्र डेस्क

Akola PM Ujjwala Scheme: देशभर में बड़े स्तर पर लागू की गई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने वर्षों तक गरीब और ग्रामीण परिवारों को धुएं वाली चूल्हों से राहत दिलाने का काम किया। इस योजना के तहत घरघर गैस पहुंचने से महिलाओं को रसोई में होने वाली परेशानियों से काफी हद तक मुक्ति मिली थी। लेकिन अब अनुदानित गैस सिलेंडरों की संख्या में लगातार की गई कटौती से गरीब और जरूरतमंद परिवारों की चिंता बढ़ गई है। लाभार्थियों का कहना है कि कम आय में बढ़ती महंगाई के बीच रसोई गैस का खर्च उठाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।

2016 में हुई थी शुरूआतउज्ज्वला योजना की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी। शुरुआत में लाभार्थियों को वर्ष में 12 गैस सिलेंडरों पर अनुदान का लाभ दिया जाता था। बाद में यह संख्या घटाकर 9 कर दी गई और अब इसे 4 सिलेंडरों तक सीमित कर दिया गया है। पहले 9 रिफिल पर प्रति सिलेंडर 300 रुपये की सब्सिडी के अनुसार लाभार्थियों को सालाना 2,700 रुपये की सहायता मिलती थी, जबकि नए प्रावधान के बाद केवल 4 सिलेंडरों पर ही 300 रुपये प्रति सिलेंडर के हिसाब से 1,200 रुपये का लाभ मिलेगा।

चूल्हे पर लौटने की आशंका

इससे लाभार्थियों को सालाना लगभग 1,500 रुपये का आर्थिक नुकसान होने की बात कही जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ ही शहरों के गरीब परिवारों में इस बदलाव को लेकर चिंता का माहौल है। कई परिवारों का कहना है कि पूरे वर्ष केवल चार अनुदानित सिलेंडरों में रसोई चलाना संभव नहीं है। दूसरी ओर, रसोई गैस की बढ़ती कीमतों ने भी उनकी परेशानी बढ़ा दी है। हाल ही में गैस सिलेंडर की कीमतों में वृद्धि के बाद एक सिलेंडर की कीमत लगभग 962 रुपये तक पहुंच गई है।

लाभार्थियों को सालाना 1500 रुपये तक का नुकसान

इसमें घर तक पहुंचाने का अतिरिक्त खर्च जोड़ने पर गरीब परिवारों के लिए एक सिलेंडर की लागत करीब एक हजार रुपये तक पहुंच रही है।महिलाओं की बढ़ी चिंता, फिर चूल्हे की ओर लौटने की आशंकामहिला लाभार्थियों का कहना है कि उज्ज्वला योजना के कारण उन्हें धुएं और चूल्हे की परेशानी से राहत मिली थी, लेकिन अब कम सब्सिडी और महंगे सिलेंडर के कारण उन्हें दोबारा पारंपरिक चूल्हों का सहारा लेने की नौबत आ सकती है। उनका कहना है कि पहले मिट्टी के तेल की सुविधा बंद हो चुकी है और अब महंगा गैस सिलेंडर खरीदना उनकी आर्थिक क्षमता से बाहर होता जा रहा है।

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