अकोला जिला परिषद-पंचायत समिति चुनाव OBC आरक्षण तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
अकोला

अकोला जिला परिषद-पंचायत समिति चुनाव: OBC आरक्षण में होगा बदलाव! सुप्रीम कोर्ट पर टिकी इच्छुकों की नजरें

Akola Rural Elections:अकोला में ओबीसी आरक्षण विवाद के कारण चुनाव स्थगित होने से इच्छुक उम्मीदवारों की तैयारी और खर्च बेकार गया।अब सबकी नजरें 23 फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय के आने वाले फैसले पर टिकी है।

रूपम सिंह

Akola OBC Reservation News: अकोला जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनावों में ओबीसी आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक हो जाने के कारण न्यायालय के आदेशानुसार चुनाव स्थगित कर दिए गए हैं। इस वजह से पहले घोषित आरक्षण में बदलाव की संभावना बन गई है और कई इच्छुक उम्मीदवारों की चिंता बढ़ गई है। राज्य के कुछ जिलों में हाल ही में पंचायत चुनावों का माहौल बना था, लेकिन अकोला जिले में आरक्षण सीमा पार होने से चुनाव प्रक्रिया रुक गई।

अब 23 फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर सुनवाई होगी। इस तारीख को चुनाव का मार्ग प्रशस्त होता है या आगे बढ़ता है, इस पर ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चाएं और अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक समीकरणों में बदलाव जिला परिषद गटों का आरक्षण पहले घोषित होने के बाद कई उम्मीदवार प्रचार और मेल जोल के काम में जुट गए थे।

नगर परिषद और महानगरपालिका चुनाव संपन्न होने के बाद अकोला जिला परिषद व पंचायत समितियों के चुनाव भी निश्चित मान लिए गए थे। मतदाताओं से संपर्क,पुराने वादों की याद दिलाना, नए समीकरणों के आधार पर उम्मीदवार तय करना, इन सब गतिविधियों ने चुनावी वातावरण को गरमाया था। लेकिन न्यायालय के आदेश से इस उत्साह पर विराम लग गया है।

इच्छुकों की नाराजी

हाल ही में शहरी क्षेत्रों में हुए चुनावों से आरक्षण राजनीतिक वातावरण में जोश आया था। ग्रामीण क्षेत्रों में भी चुनावी माहौल बनने लगा था। इच्छुक उम्मीदवारों ने कार्यकर्ताओं की फौज तैयार की थी, भोजन-पानी की व्यवस्था की थी और नेताओं की नजर में आने के लिए खर्च भी किया था।

लेकिन अचानक चुनाव स्थगित होने से इन तैयारियों पर पानी फिर गया और खर्च पर भी लगाम लग गई। इस तरह अकोला जिले में ओबीसी आरक्षण सीमा पार होने से चुनाव स्थगित होना ग्रामीण राजनीति में बड़ा झटका माना जा रहा है। अब सर्वोच्च न्यायालय के 23 फरवरी के निर्णय पर ही चुनावी प्रक्रिया निर्भर करेगी। इच्छुक उम्मीदवारों और मतदाताओं की निगाहें मिनी मंत्रालय और न्यायालय के फैसले पर टिकी हुई हैं।

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