Swamitva Yojana Faces Deadlock In Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश में ग्रामीण आबादी को उनकी जमीन का कानूनी मालिकाना हक दिलाने के लिए शुरू की गई स्वामित्व योजना जमीनी स्तर पर एक बड़े प्रशासनिक और विधिक गतिरोध में फंस गई है। इस महत्वाकांक्षी पहल को रफ्तार देने के लिए बीजेपी के वरिष्ठ नेता नितिन नबीन की मौजूदगी में अभियान का औपचारिक शुभारंभ किया गया था, लेकिन तीन हफ़्ते से अधिक (22 दिन) का समय बीत जाने के बाद भी पोर्टल पर प्रगति शून्य दर्ज है।
योजना की तय समय-सीमा सिर पर है, शासन का दबाव बढ़ रहा है और दूसरी ओर प्रदेश भर के 23,000 से अधिक पटवारी काम का बहिष्कार कर आर-पार के मूड में हैं।
नवभारत मध्य प्रदेश के डिजिटल स्टेट हेड सुधीर दंडोतिया के इनपुट के मुताबिक, यह सिर्फ काम के बोझ का विरोध नहीं, बल्कि कानून के कठघरे में खड़े होने का सीधा डर है। पटवारियों का साफ कहना है कि जब तक सरकार विधिक रास्ता साफ नहीं करती, वे ‘रजिस्ट्री निष्पादक’ (दस्तावेज विक्रेता) के रूप में दस्तखत नहीं करेंगे क्योंकि विवादित ग्रामीण जमीनों की रजिस्ट्री होते ही भविष्य के सिविल मुकदमों में पहली गाज उन्हीं पर गिरेगी।
आइए अब 4 सवालों में इस एक्सप्लेनर में समझें कि आफिस-आफिस चल रहे इस टकराव की असल जड़ क्या है, कानून का कौन सा पेंच पटवारियों को डरा रहा है और क्या सरकार बिना पटवारियों के इस योजना को आगे बढ़ा सकती है?
उत्तर: पटवारियों, तहसीलदारों और राजस्व निरीक्षक संघों का मुख्य विरोध यह है कि उन्हें स्वामित्व योजना के तहत 'रजिस्ट्री के निष्पादक' (Registrar/Executor) के रूप में हस्ताक्षर करने की जिम्मेदारी दी जा रही है। उनका तर्क है कि जिस संपत्ति पर उनका कोई व्यक्तिगत स्वामित्व या कानूनी अधिकार नहीं है, उसके दस्तावेजों पर उन्हें 'निष्पादक' बनाने से भविष्य में जमीन से जुड़े विवाद होने पर उन्हें कोर्ट-कचहरी और कानूनी कार्रवाई (कानून का डर) का सामना करना पड़ सकता है।
साथ ही, उनका कहना है कि यह उनके नियमित राजस्व कार्यों (जैसे सर्वे, सीमांकन और रिकॉर्ड जांच) से अलग और अतिरिक्त जिम्मेदारी है।
उत्तर: संघों का हवाला है कि 13 अगस्त के आदेश में पटवारी को दस्तावेज निष्पादन की भूमिका दिए जाने की बात तो है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह अधिकार किस अधिनियम, नियम, राजपत्र या वैध डेलीगेशन (प्रत्यायोजन) के तहत मिला है। उन्होंने इस आदेश से जुड़ी मूल फाइलों और रिकॉर्ड की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 या भू-अभिलेख नियमावली 2020 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
उत्तर: सरकार बेहद कड़े रुख में है। मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कलेक्टरों और कमिश्नरों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे तुरंत रजिस्ट्री का काम शुरू करवाएं। कलेक्टरों को 7 दिन की मोहलत दी गई है कि वे परफॉर्मेंस दिखाएं, वरना उनका परफॉर्मेंस रिव्यू किया जाएगा और काम पूरा न होने पर इसे 'फेलियर' माना जाएगा।
अब तक 3430 पटवारी को नोटिस दिए गए है, 129 सस्पेंड किये गए है, 29 पटवारी बर्खास्त हुए है, कलेक्टरों को अल्टीमेटम दिया गया है...फिर भी नतीजा- शून्य है यानी एक भी रजिस्ट्री नहीं हुई है। आदेश की अवहेलना और कार्य बहिष्कार के चलते अब तक 3,430 से अधिक पटवारियों को नोटिस, 129 को निलंबित और 29 पटवारियों को बर्खास्त किया जा चुका है। इसके विरोध में प्रदेशभर के पटवारियों ने सामूहिक अवकाश (गुरुवार से रविवार तक) ले लिया है।
उत्तर: मध्य प्रदेश में सामान्य दिनों में रोजाना औसतन 3,500 से 4,000 रजिस्ट्रियां होती हैं। स्वामित्व योजना के कार्यों के ठप होने से ग्रामीण परिवारों को उनकी आवासीय भूमि का कानूनी मालिकाना हक (प्रॉपर्टी कार्ड) मिलने की पूरी प्रक्रिया बाधित हो गई है और जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।