Bhopal Patwari Transfer News: राजधानी भोपाल में पटवारियों के तबादलों को लेकर प्रशासनिक कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। कलेक्टर कार्यालय द्वारा जारी ट्रांसफर लिस्ट महज 24 घंटे के भीतर बदल दिए जाने से पूरे मामले में पारदर्शिता और नियमों के पालन पर चर्चा तेज हो गई है। पहले जारी आदेश में जिन पटवारियों को लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ रहने के कारण हटाया गया था, उनमें से आधे से अधिक कर्मचारियों को अगले ही दिन राहत मिल गई।
15 जून को जारी आदेश के तहत 46 पटवारियों का तबादला किया गया था। इनमें अधिकांश कर्मचारी ऐसे थे जो पिछले कई सालों से हुजूर और कोलार तहसीलों में कार्यरत थे। कुछ पटवारी अपनी गृह तहसील में भी पदस्थ बताए गए थे। लेकिन अगले ही दिन देर रात संशोधित सूची जारी की गई, जिसमें 24 नाम हटा दिए गए और उनके तबादले प्रभावी रूप से निरस्त हो गए।
सूत्रों के अनुसार संशोधित ट्रांसफर लिस्ट में केवल 30 पटवारियों के नाम रखे गए। इनमें भी बड़ी संख्या हुजूर और कोलार क्षेत्र से संबंधित रही। प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि प्रभावशाली संपर्कों और सिफारिशों के चलते कुछ कर्मचारियों के नाम सूची से हटाए गए। खास बात यह भी है कि संशोधित सूची से बाहर हुए कुछ पटवारियों के नाम पूर्व में चर्चित मीडिया स्टिंग ऑपरेशन में भी सामने आ चुके हैं। इनमें निधि नेमा और किशोर सिंह दांगी का नाम प्रमुख रूप से लिया जा रहा है। दोनों को भी संशोधित आदेश में राहत मिल गई।
जानकारी के मुताबिक राहत पाने वाले कई पटवारी वर्ष 2015 से 2022 के बीच लगातार एक ही क्षेत्र में पदस्थ रहे हैं। इसके बावजूद उनके नाम अंतिम सूची से हटने पर सवाल उठ रहे हैं। वहीं राजनीतिक हस्तक्षेप की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं, क्योंकि राहत पाने वालों में अधिकांश हुजूर और कोलार क्षेत्र के कर्मचारी बताए जा रहे हैं। भोपाल जिले में कुल 243 पटवारी पदस्थ हैं और नीति के अनुसार अधिकतम 20 प्रतिशत यानी 47 कर्मचारियों के ही तबादले किए जा सकते हैं। पहले 46 तबादले और बाद में संशोधित आदेश जारी होने से पूरी प्रक्रिया को लेकर विशेषज्ञों ने नियमों की व्याख्या पर प्रश्न खड़े किए हैं।
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इसके अलावा आदेश जारी करने की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में आ गई है। पहला आदेश हस्ताक्षरित स्वरूप में जारी किया गया था, जबकि संशोधित सूची ई-ऑफिस प्रणाली के माध्यम से जारी हुई। संशोधित आदेश में पूर्व आदेश को स्पष्ट रूप से निरस्त करने का उल्लेख नहीं होने से प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। अब पूरे मामले के सामान्य प्रशासन विभाग तक पहुंचने और जांच की संभावना जताई जा रही है।