स्कूल जाने से डरना और बार-बार बीमारी का बहाना बनाना बुलिंग के संकेत हो सकते हैं।
पढ़ाई, नींद, खानपान और दोस्तों से मिलने में बदलाव पर ध्यान दें।
बच्चे को भरोसा दिलाएं और जरूरत पड़ने पर स्कूल व काउंसलर की मदद लें।
Child Bullying Symptoms: जब कोई बच्चा स्कूल जाता हैं, तो वह वहां केवल किताबी ज्ञान नहीं पाता है, बल्कि उसके साथ-साथ नए दोस्त बनाना, बोलना-चलना, सामाजिक व्यवहार, सोशलाइजिंग, विकट परिस्थिति से लड़ना औऱ दुनिया को समझने जैसी तमाम चीजें भी सीखता है।
लेकिन अगर कोई बच्चा स्कूल में लगातार किसी के मजाक, ताने, धमकी या मारपीट का सामना कर रहा है, तो उसके लिए स्कूल जाना डरावना अनुभव हो सकता है, जिसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। कई बार बच्चे बुलिंग का शिकार होने के बावजूद माता-पिता को कुछ नहीं बताते। उन्हें डर रहता है कि शिकायत करने पर दूसरे बच्चे उन्हें और परेशान करेंगे या उनकी बात को समझा नहीं जाएगा।
आइए जानते हैं कि बच्चा बुलिंग का शिकार हो रहा है तो उसके व्यवहार को कैसे समझें और ऐसी स्थिति में माता-पिता क्या कर सकते हैं?
अगर बच्चा पहले खुशी-खुशी स्कूल जाता था, लेकिन अब रोज सुबह स्कूल जाने से मना करता है, तो इस बदलाव को इग्नोर न करें। हो सकता है कि उसे स्कूल में किसी बच्चे से डर लग रहा हो या वहां उसे कोई समस्या हो रही हो।
कई बच्चे स्कूल बस में बैठने, किसी खास क्लास में जाने या लंच ब्रेक के दौरान बाहर निकलने से भी बचते हैं। अगर ये शिकायतें बार-बार सामने आ रही हैं, तो बच्चे से प्यार से बात करें और परेशानी की वजह जानने की कोशिश करें।
बच्चे के शरीर पर बार-बार चोट, खरोंच या नीले निशान दिखाई देना भी बुलिंग का संकेत हो सकता है। इसके अलावा स्कूल से लौटने पर उसकी किताबें, पेंसिल बॉक्स, पानी की बोतल, टिफिन या कपड़े खराब मिलते हैं, तो इस पर ध्यान दें।
बुलिंग का असर बच्चे के व्यवहार में भी दिखाई देता है। जो बच्चा पहले घर आकर स्कूल की सारी बातें बताता था, दोस्तों के साथ खेलता था और परिवार के साथ समय बिताता था, वह अचानक अकेले रहने लगता है।
कुछ बच्चे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं, जबकि कुछ बहुत शांत और उदास रहने लगते हैं। कई बार बच्चे अपनी बात बोलकर नहीं बता पाते हैं, इसलिए उनके व्यवहार में बदलाव पर ध्यान दें।
अगर बच्चे के नंबर अचानक कम होने लगे हैं, वह होम वर्क पूरा नहीं कर रहा है या क्लास में ध्यान नहीं दे पा रहा है, तो इसकी वजह सिर्फ पढ़ाई में इंटरेस्ट कम होना नहीं होता है। बुलिंग के कारण बच्चा स्कूल में असुरक्षित महसूस करता है। उसका ध्यान पढ़ाई के बजाय इस बात पर लगा रहता है कि लंच ब्रेक में कौन उसे परेशान करेगा या क्लास में उसका मजाक तो नहीं उड़ाया जाएगा।
बच्चे का रात में ठीक से न सोना, बार-बार डरकर उठना या बुरे सपने देखना भी संकेत हो सकता है। कुछ बच्चे पहले की तुलना में कम खाना खाने लगते हैं, जबकि कुछ मेंटल स्ट्रेस के कारण ज्यादा खाने लगते हैं। इन लक्षणों के पीछे दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम भी हो सकती हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लें।
बच्चे के दोस्त उसकी सामाजिक और भावनात्मक दुनिया का अहम हिस्सा होते हैं। अगर वह अचानक अपने दोस्तों से मिलना बंद कर दे, बर्थडे पार्टी में जाने से मना करे या स्कूल में किसी के साथ बैठने से डरने लगे, तो इस पर ध्यान दें।
आजकल बुलिंग सिर्फ स्कूल की क्लास या खेल के मैदान तक सीमित नहीं है। आज के जमाने में सोशल मीडिया, मैसेजिंग ग्रुप और ऑनलाइन गेमिंग के दौरान भी बच्चों को परेशान किया जाता है। इसे साइबर बुलिंग कहते हैं।
अगर बच्चा मोबाइल देखने के बाद अचानक उदास या गुस्से में आ जाता है, किसी मैसेज या नोटिफिकेशन से डरने लगता है या अपना फोन छिपाने लगता है, तो उससे बात करें। ऐसी स्थिति में बच्चे को दोष देने के बजाय उसका भरोसा जीतें। ऑनलाइन परेशान करने वाले मैसेज, स्क्रीनशॉट और दूसरी सामग्री को सबूत के तौर पर सुरक्षित रखें।
बच्चे की बात ध्यान से सुनें। उससे जानने की कोशिश करें कि स्कूल में उसका दिन कैसा रहा और क्या कोई ऐसी बात हुई जिससे उसे बुरा लगा। बीच में टोके बिना उसकी बात सुनें।
बच्चे को बताएं कि जो कुछ हुआ, उसके लिए वह जिम्मेदार नहीं है और आप उसकी मदद के लिए मौजूद हैं।
क्लास टीचर, स्कूल काउंसलर या प्रिंसिपल को पूरी स्थिति बताएं। घटना कब हुई, कहां हुई और कौन-कौन मौजूद था, इसकी जानकारी साझा करें। जरूरत पड़ने पर लिखित कंप्लेंट भी दें।
अगर बच्चे के साथ बार-बार ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो तारीख, समय, चोट के निशान और संबंधित मैसेजेज का रिकॉर्ड रखें। साइबरबुलिंग के मामले में स्क्रीनशॉट और लिंक सेव रखना भी काम आता है।
बच्चों के साथ समय बिताएं और उसका भरोसा जीतें, उसे विश्वास पैदा करने की कोशिश करें। जरूरत पड़ने पर बाल मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की मदद लें।