गोलगप्पे की शुरुआत कहां हुई?
द्रौपदी और मगध से जुड़ी कहानियां इसके इतिहास में प्रचलित हैं।
अलग-अलग राज्यों में गोलगप्पे के नाम, फिलिंग और पानी का स्वाद बदल जाता है।
Golgappa History in India: भारत में स्ट्रीट फूड का नाम आते ही सबसे पहला नाम गोलगप्पे का आता है। छोटी-सी कुरकुरी, फूली हुई पूरी में आलू या चने-मटर की भरावन, ऊपर से खट्टा-तीखा-चटपटा पानी और मसालों का स्वाद इसे खास बनाता है। बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर किसी को यह पसंद आता है।
लेकिन गोलगप्पे की शुरुआत कब और कहां हुई, इसका कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिलता है। इसके इतिहास को लेकर कई कहानियां और दावे प्रचलित हैं। इनमें एक कहानी प्राचीन मगध से जुड़ी है, जो आज के बिहार में स्थित है।
गोलगप्पे के इतिहास से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी महाभारत और द्रौपदी से जोड़ी जाती है। प्रचलित कथा के अनुसार, पांडवों से विवाह के बाद कुंती ने द्रौपदी को बेहद कम सामग्री दी और भोजन तैयार करने को कहा। कहा जाता है कि द्रौपदी ने बचे हुए आटे और आलू का इस्तेमाल करके ऐसा व्यंजन बनाया, जो कुछ-कुछ आज के गोलगप्पे जैसा था।
गोलगप्पे की लोकप्रियता के पीछे इसका स्वाद, कम कीमत और आसानी से मिल जाना बड़ी वजह हैं। इसे तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली पूरी, भरावन और पानी स्थानीय पसंद और खान-पान के हिसाब से बदलते रहते हैं। यही वजह है कि अलग-अलग शहरों में इसका स्वाद अलग मिलता है।
कहीं आलू और मसालेदार पानी का मेल पसंद किया जाता है, तो कहीं सफेद मटर, चने या खट्टी-मीठी चटनी का इस्तेमाल होता है। पुदीना, धनिया, इमली और अलग-अलग मसालों से तैयार पानी इसके स्वाद को और खास बनाता है। आज हर सड़क के किनारे ठेलों से लेकर रेस्तरां तक में कई प्रकार के गोलगप्पे मिलते हैं।
गोलगप्पे की खासियत सिर्फ इसका स्वाद नहीं, बल्कि इसके अलग-अलग नाम भी हैं।
गोलगप्पे: दिल्ली और उत्तर भारत के कई इलाकों में यह नाम लोकप्रिय है।
पानी पुरी: महाराष्ट्र, गुजरात और कई अन्य क्षेत्रों में इसे पानी पुरी कहा जाता है।
फुचका या पुचका: पश्चिम बंगाल, खासकर कोलकाता, में यह नाम प्रचलित है। बिहार के कुछ हिस्सों में भी फुचका कहा जाता है।
गुपचुप: ओडिशा और आसपास के कुछ इलाकों में इसे गुपचुप कहते हैं।
फुल्की: मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में यह नाम सुनने को मिलता है।
पानी पताशे: उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में इसे इस नाम से भी जाना जाता है।
इसका सबसे पहला कारण इसका स्वाद है, जब कि दूसरा कारण इसका सस्ती और आसान उपलब्धता है। लोग इसे दोस्तों और परिवार के साथ खाना पसंद करते हैं। दुकानदार भी स्थानीय पसंद के हिसाब से पानी, मसालों और भरावन में बदलाव करते रहते हैं। इस तरह गोलगप्पे ने अलग-अलग शहरों में अपनी जगह बना ली है।
गोलगप्पे की असली शुरुआत को लेकर भले ही इतिहास पूरी तरह स्पष्ट न हो, लेकिन इसकी लोकप्रियता आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। मगध से जुड़ा दावा हो या द्रौपदी की कहानी, ये किस्से इस चटपटे व्यंजन को लेकर लोगों की दिलचस्पी जरूर बढ़ाते हैं। आखिरकार, भारत के हर हिस्से में इसका अलग नाम और स्वाद ही इसे खास बनाता है।
गोलगप्पे का नाम भी इसके खाने के अंदाज से जुड़ा माना जाता है। ‘गोल’ यानी गोल क्रिस्पी पूरी, जबकि ‘गप्पा’ एक ही बार में मुंह में डालकर खाने के तरीके को कहा जाता है। प्लेट खत्म होने के बाद दुकानदार से सूखी पुरी मांगना भी गोलगप्पे खाने का रिचुअल है। इसमें आलू और मसाले तो होते हैं, लेकिन पानी नहीं डाला जाता। कई दुकानदार इसे मुफ्त में देते हैं, ताकि तीखे पानी के बाद कुछ राहत मिल सके।
आज गोलगप्पे बनाने और परोसने के तरीकों में भी बदलाव आया है। साफ-सफाई को ध्यान में रखते हुए कई दुकानदार फिल्टर पानी का इस्तेमाल करते हैं, वहीं कई लोग इसे एयरफ्रायर रेसिपी के तौर पर बनाने लगे हैं।