संदर्भ चित्र- मिच्छमी दुक्कड़म (सोर्स- सोशल मीडिया) 
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श्वेताम्बर जैन समुदाय मना रहा है 'मिच्छामी दुक्कड़म', क्षमा और शुद्धि का खास दिन

Michhami Dukkadam: संवत्सरी के दिन जैन धर्मावलंबी पश्चाताप के जरिए आत्मा को शुद्ध करते हैं। इस मौके पर वे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को व्यक्तिगत या संदेशों के माध्यम से 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहते हैं।

अभिषेक सिंह

Michhami Dukkadam: भाद्रपद माह के दौरान मनाए जाने वाले जैन पर्व पर्युषण के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन, संवत्सरी, को श्वेताम्बर जैन समुदाय ने क्षमा और पश्चाताप के साथ मनाया। यह दिन 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहकर सभी जीवित प्राणियों से मन, वचन और कर्म से हुई गलतियों के लिए माफी मांगने का प्रतीक है।

क्षमा का वार्षिक दिवस

संवत्सरी का अर्थ है 'वर्ष भर की क्षमा'। इस दिन जैन धर्मावलंबी गहन पश्चाताप के माध्यम से अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं। इस अवसर पर, वे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को व्यक्तिगत रूप से या संदेशों के माध्यम से 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहते हैं। जैन धर्म की मान्यता के अनुसार, संवत्सरी के बाद कोई भी निजी झगड़ा या विवाद जारी नहीं रखा जा सकता। इस पवित्र दिन को मनाने के लिए कई जैन पूर्ण उपवास भी रखते हैं।

संवत्सरी और क्षमावाणी में अंतर

हालांकि संवत्सरी (श्वेताम्बर संप्रदाय) और क्षमावाणी (दिगंबर संप्रदाय) दोनों को 'क्षमा दिवस' के रूप में जाना जाता है, पर दोनों के बीच एक सूक्ष्म अंतर है। दोनों ही पर्युषण पर्व के अंतिम दिन पड़ते हैं, लेकिन ये दो अलग-अलग दिन होते हैं, क्योंकि दोनों संप्रदायों के पर्युषण पर्व की तिथियां और अवधि अलग होती हैं। श्वेताम्बर समुदाय संवत्सरी को भाद्रपद माह की शुक्ल चतुर्थी को मनाता है, जबकि दिगंबर समुदाय इसे चंद्र आधारित जैन कैलेंडर के अनुसार अश्विन माह के पहले दिन मनाता है।

जैन धर्म: एक शाश्वत मार्ग

जैन धर्म खुद को एक शाश्वत (अनादि और अनंत) धर्म मानता है। जैन धर्म के अनुसार, यह किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं बनाया गया है, बल्कि समय-समय पर तीर्थंकरों द्वारा इस शाश्वत मार्ग की फिर से खोज और शिक्षा दी गई है।

हालांकि, ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जीवनकाल (लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व) को एक संगठित धर्म के रूप में इसकी ऐतिहासिक शुरुआत माना जाता है। वहीं, पुरातात्विक साक्ष्य, जैसे कि सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों पर मिली जैन आकृतियां, भी इसके एक बहुत ही प्राचीन धर्म होने की ओर इशारा करती हैं। जैन धर्म का मूल सिद्धांत प्रकृति के नियमों का पालन करना है, जो अविनाशी हैं, जिससे यह जीवन और आध्यात्मिकता का एक शाश्वत मार्ग बन जाता है।

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