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पहाड़ों में रोजगार के खुलेंगे नए रास्ते, सस्टेनेबल माउंटेन समिट से मिली नई पहचान
जम्मू-कश्मीर में विकास की नई पहल, 7-8 हजार युवाओं को रोजगार से जोड़ने का दावा
पहली बार सस्टेनेबल माउंटेन समिट का आयोजन, जितेंद्र सिंह बोले- 8 हजार युवाओं को मिला रोजगार का अवसर
Sustainable Mountain Summit In Srinagar For The First Time: कभी आतंकवाद की भेंट चढ़े जम्मू-कश्मीर अब विकास की नई कहानी लिख रहा है। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार जम्मू-कश्मीर में आयोजित सस्टेनेबल माउंटेन डेवलपमेंट समिट और एग्रीकल्चर साइंस कांग्रेस के 13वें सत्र का आयोजन किया गया है। इस सत्र को लेकर केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इस समिट के जरिए जम्मू-कश्मीर को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है और हजारों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं।
केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि सस्टेनेबल माउंटेन डेवलपमेंट समिट पहली बार जम्मू-कश्मीर में हुआ है। यह ऑल इंडिया समिट था। जम्मू-कश्मीर के हवाले से कई प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं। आज जम्मू-कश्मीर की पहचान पूरे देश में बनी है। 7 से 8 हजार नौजवानों को रोजगार का नया जरिया मिला है।
यह समिट शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी ऑफ कश्मीर (एसकेयूएएसटी-के) में आयोजित किया गया। इस तीन दिवसीय समिट का मुख्य विषय समावेशी विकसित भारत के लिए टिकाऊ हिमालयी परिदृश्य को आकार देना रहा।
केंद्रीय राज्य मंत्री ने 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए एसकेयूएएसटी-के के वाइस चांसलर प्रोफेसर नजीर अहमद गनई और पूरी फैकल्टी का आभार जताया। उन्होंने लिखा, 3 दिन तक चले ऑल इंडिया सस्टेनेबल माउंटेन डेवलपमेंट समिट के दौरान सम्मान करने के लिए एसकेयूएएसटी-के के वाइस-चांसलर प्रोफेसर नजीर अहमद गनई और फैकल्टी का धन्यवाद।
केंद्रीय राज्य मंत्री ने 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि लद्दाख और जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक फैली 2,500 किलोमीटर लंबी हिमालय पर्वतमाला, भारतीय उपमहाद्वीप की उत्तरी सीमा की रक्षा करने वाली एक मज़बूत दीवार की तरह खड़ी है। साथ ही, यह शानदार पर्वतमाला बड़ी नदियों, खूबसूरत झरनों और विशाल बर्फ़ीले ग्लेशियरों का स्रोत भी है, और इसकी खड़ी ढलान पानी के बहाव को नियंत्रित करती है।
विडंबना यह है कि हिमालय की यही सक्रियता और भव्यता कभी-कभी अचानक बाढ़, भूस्खलन और जलवायु संबंधी चुनौतियों जैसी मुश्किलों का कारण भी बन जाती है। इसलिए, सुरक्षा उपायों की ज़रूरत है। हिमालय और हिमालयी इकोसिस्टम को बचाना एक राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी है, और इसमें हर नागरिक की भागीदारी है।
जम्मू-कश्मीर में ग्लेशियोलॉजी (हिमनद विज्ञान) में क्षमता निर्माण का पहला कार्यक्रम भी शुरू किया गया है और वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून ने जम्मू-कश्मीर के 10 गांवों में एक पायलट स्टडी शुरू की है।...एजेंसी इनपुट के साथ।