पूर्व उप प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित लालकृष्ण आडवाणी सोर्स: गूगल इंटरनेट
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BJP नेता लालकृष्ण आडवाणी के बेटे कौन हैं? वे राजनीति में क्यों नहीं आए

Lal Krishna Advani News: लालकृष्ण आडवाणी 99 साल पूरे कर 100वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। इस मौके पर उनके बेटे ने हवन किया और उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना की।

अमन कुमार पाण्डेय

Highlights:

लालकृष्ण आडवाणी ने 99 साल पूरे कर जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश किया।

बेटे ने हवन कर पिता की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की।

जानिए कौन हैं उनके बेटे और क्यों राजनीति से दूर रहे।

Lal Krishna Advani Birthday: पूर्व उप प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित लालकृष्ण आडवाणी 99 साल पूरे कर अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। इस अवसर पर उनके आवास पर हवन और पूजा-पाठ का आयोजन किया गया। इसमें बीजेपी के कई नेता और पार्टी कार्यकर्ता शामिल हुए। आडवाणी के बेटे जयंत आडवाणी ने इस मौके पर सभी लोगों का आभार जताया और पिता के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की।

जयंत आडवाणी ने कहा, "मुझे बहुत खुशी है कि आडवाणी जी ने 99 साल पूरे कर लिए हैं और आज वे अपने 100वें साल में प्रवेश कर रहे हैं। यहां आए सभी पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का मैं दिल से धन्यवाद करता हूं। हमने उनके लिए हवन किया और प्रार्थना की। ईश्वर से कामना है कि उनके जीवन का आगे का समय अच्छे स्वास्थ्य के साथ बीते।"

कौन हैं जयंत आडवाणी?

जयंत आडवाणी बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के बेटे हैं। वह आडवाणी और उनकी दिवंगत पत्नी कमला आडवाणी के पुत्र हैं। उनकी एक बहन प्रतिभा आडवाणी हैं। जयंत पेशे से कारोबारी हैं और अपने पिता की तरह सक्रिय राजनीति में नहीं रहे हैं।

माना जाता है कि लालकृष्ण आडवाणी परिवारवाद के आरोपों से बचना चाहते थे। इसी वजह से उन्होंने अपने बेटे को चुनावी राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया। हालांकि, जयंत ने एक इंटरव्यू में राजनीति में आने की इच्छा जाहिर की थी। वह कई मौकों पर अपने पिता के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों और चुनाव प्रचार में दिखाई दिए हैं। उन्होंने गुजरात के गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र में आडवाणी के लिए घर-घर जाकर प्रचार भी किया था।

कराची में हुआ था लालकृष्ण आडवाणी का जन्म

लालकृष्ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को अविभाजित भारत के कराची में हुआ था। 20 साल की उम्र में वह भारत आ गए। इसके बाद राजस्थान और फिर दिल्ली में रहे। संस्कृत के विद्वान दादा और पिता के प्रभाव ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में भूमिका निभाई।

खादी का कुर्ता, काले फ्रेम का चश्मा और सादगी भरा व्यक्तित्व उनकी पहचान रहा। हालांकि, इस सादगी के पीछे एक ऐसा राजनीतिक मस्तिष्क था, जिसने कई दशकों तक भारतीय राजनीति की दिशा और दशा को प्रभावित किया।

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