डॉ. श्यामा प्रसाद ने नेहरू कैबिनेट से क्यों दिया था इस्तीफा? ( AI जेनरेटेड इमेज) 
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Explainer: क्या था लियाकत समझौता? जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने छोड़ दी नेहरू कैबिनेट, रख डाली जनसंघ की नींव

Shyama Prasad Mukherjee: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 'नेहरू-लियाकत समझौते' के खिलाफ थे। उनका मानना था कि यह समझौता पूरी तरह एकतरफा और खोखला है। विभाजन के बाद का इतिहास भी इस बात का गवाह है।

मनोज आर्या

Why Shyama Prasad Mukherjee Left Nehru Cabinet: भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 6 अप्रैल 1950 को आजाद भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। यह एक ऐसा साहसी कदम था, जो किसी के लिए भी आम बात नहीं थी। क्योंकि उस वक्त नेहरू कैबिनेट में शामिल होना ही बेहद गौरव की बात मानी जाती थी, तब डॉ. मुखर्जी ने अपने सिद्धांतों और देशहित के सवाल पर बिना कुछ सोचे-समझे एक झटके में मंत्री का पद छोड़ दिया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास की वह सबसे पहली और बड़ी राजनीतिक घटना थी, जिसने देश की राजनीति की दिशा और दशा हमेशा के लिए बदल दी।

प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट से खुद को अलग करने के बाद डॉ. मुखर्जी शांत नहीं बैठे। तब उन्हें एक बात समझ आई कि देश को कांग्रेस के सामने एक मजबूत राष्ट्रवादी राजनीति पार्टी की जरूरत है। इसी एहसास के साथ उन्होंने अक्टूबर 1951 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की मदद से 'भारतीय जनसंघ' की नींव रखी। यह जनसंघ वहीं है, जो आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और देश की सत्ता का बागडोर अपने हाथों में थामी हुई है।

जब नेहरू कैबिनेट छोड़े डॉ. मुखर्जी

हालांकि, सवाल उठता है कि जब हर कोई प्रधानमंत्री नेहरू के कैबिनेट का हिस्सा बनना चाह रहा था, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मंत्रिमंडल से खुद को अलग क्यों किया? आखिर वो क्या वजह रही थी कि डॉ मुखर्जी को उस कांग्रेस पार्टी का त्याग करना पड़ा, जिसके जरिए उन्होंने भारत के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी। डॉ. मुखर्जी के कांग्रेस और नेहरू कैबिनेट छोड़ने के पीछे मुख्य वजह थी- 'नेहरू-लियाकत समझौता', जिसे दिल्ली पैक्ट के नाम से भी जाना जाता था। लेकिन इस समझौते में ऐसा क्या था, जो डॉ मुखर्जी को मंत्रिमंडल से हटने के लिए मजबूर कर दिया? आइए उन सभी पहलुओं को इस एक्सप्लेनर के जरिए विस्तार से समझते हैं।

8 अप्रैल,1950 को दिल्ली पैक्ट पर हस्ताक्षर करते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू और लियाकत अली, (सोर्स- सोशल मीडिया)

'नेहरू-लियाकत समझौता' क्या था?

इस पूरे मामले को समझने को लिए हमें थोड़ा इतिहास को जानना होगा। 1947 में भारत के दो हिस्सों में बंटवारे के बाद पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान में रह रहे हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा और अत्याचार की घटनाएं हो रही थीं। विशेष रूप से बंगाल में हिंदुओं के नरसंहार, जबरन धर्म परिवर्तन और महिलाओं के साथ क्रूरता की खबरें लगातार आ रही थीं। इन हालातों को लेकर डॉ. मुखर्जी बेहद चिंतित और आक्रोशित थे।

इस संकट को टालने के लिए तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच दिल्ली में एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने वादा किया कि वे अपने-अपने देश में अल्पसंख्यकों (भारत में मुसलमानों और पाकिस्तान में हिंदुओं/सिखों) की सुरक्षा, संपत्ति और अधिकारों की पूरी गारंटी देंगे।

समझौते के खिलाफ क्यों थे डॉ. मुखर्जी?

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पूरी तरह से 'नेहरू-लियाकत समझौते' के खिलाफ थे। उनका मानना था कि यह समझौता पूरी तरह एकतरफा और खोखला है। उनके विरोध की मुख्य बातें ये थीं-

  1. पाकिस्तान पर अविश्वास: डॉ. मुखर्जी का तर्क था कि पाकिस्तान एक घोषित इस्लामिक देश है और वह किसी भी हाल में अपने यहां अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा नहीं करेगा। आज बंटवारे और उसके बाद का इतिहास भी इस बात की गवाही देता है कि चिंता सच साबित हुई।
  2. अल्पसंख्यकों को अधर में छोड़ना: डॉ. मुखर्जी का मानना था सरकार इस समझौते के तहत पूर्वी पाकिस्तान में रह रहे लाखों हिंदुओं को उनके हाल पर छोड़ रही है, जबकि बंटवारे के समय भारत के नेताओं ने उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ली थी।
  3. नेहरू की नीति से असहमति: नेहरू की पाकिस्तान के प्रति 'नरम नीति' से डॉ. मुखर्जी बिलकुल भी सहमत नहीं थे। उनका तर्क था कि अगर पाकिस्तान में हिंदुओं पर हिंसा और अत्याचार नहीं रुक रहे हैं, तो भारत को कड़े आर्थिक और राजनीतिक कदम उठाने चाहिए, यहां तक कि जरूरत पड़ने पर भूभाग की मांग भी करनी चाहिए।

संसद में ऐतिहासिक भाषण और इस्तीफा

जब जवाहरलाल नेहरू ने इस समझौते पर आगे बढ़ने का फैसला किया, तो डॉ. मुखर्जी ने कैबिनेट की बैठकों में अपनी असहमति दर्ज कराई। जब बात नहीं बनी, तो उन्होंने कैबिनेट से अलग होना ही बेहतर समझा। 6 अप्रैल 1950 को इस्तीफा देने के बाद, 19 अप्रैल 1950 को उन्होंने संसद में अपना ऐतिहासिक बयान पढ़ा। उन्होंने साफ कहा कि मेरी धारणा है कि पाकिस्तान की सरकार का मुख्य उद्देश्य हिंदुओं को पूरी तरह से खत्म करना या उन्हें देश से बाहर निकालना है। ऐसे में यह समझौता केवल एक दिखावा है जो लोगों को धोखे में रखता है।

1948 में अहमदाबाद की एक सभा में भाषण देते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, (सोर्स- सोशल मीडिया)

इस्तीफे का देश की राजनीति पर क्या असर?

नेहरू कैबिनेट से हटने के बाद डॉ. मुखर्जी शांत नहीं बैठे। उन्होंने महसूस किया कि देश को कांग्रेस के सामने एक मजबूत राष्ट्रवादी विकल्प की जरूरत है। इसी सोच के साथ उन्होंने अक्टूबर 1951 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सहयोग से 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की। यही भारतीय जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में सामने आया, जो आज देश की सत्ता पर काबिज है।

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