Why is Manusmriti in controversy? कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी के बयान से एक बार फिर मनुस्मृति पर नई बहस शुरू हो गई है। कांग्रेस नेता ने मनुस्मृति की आलोचना करते हुए इसे महिला विरोधी बताया। महाराष्ट्र के पुणे में शनिवार को आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में बोलते हुए राहुल गांधी ने मनुस्मृति का जिक्र किया। इसके बाद भाजपा नेता ने उनके बयान पर पलटवार किया।
मनुस्मृति में महिलाओं को लेकर लिखे गए एक उद्धरण (Citation) को शर्मनाक बताते हुए राहुल गांधी ने कहा कि महिलाएं किसी के अधीन नहीं हो सकती हैं। यह एक काफी बड़ी समस्या है, मैं जब भी पुरुषों से बात करता हूं, महिलाओं को तीन बॉक्स बेटी, पत्नी या मां के रूप में रखा जाता है।
राहुल गांधी ने अपने बयान में आगे कहा कि महिलाओं को मां, पत्नी और बेटी के रूप में देखे जाने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन किसी महिला की सिर्फ यही पहचान नहीं हो सकती। ऐसे में मनुस्मृति को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। एक तरफ कुछ वे लोग हैं, जो दावा करते हैं कि मनुस्मृति में महिला विरोधी बातें लिखी गई हैं।
वहीं, दूसरी ओर वे लोग हैं, जो मनुस्मृति के पक्षधर हैं। आइए इन तमाम दावों के बीच इस एक्सप्लेनर के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि मनुस्मृति क्या है? आखिर इसमें महिलाओं को लेकर क्या लिखा और कहा गया है?
विकिपीडिया के मुताबिक, मनुस्मृति सनातन धर्म का एक प्राचीन स्मृति ग्रन्थ है। इसका एक नाम मानव धर्मशास्त्र भी है। हिन्दु समाज में इसका स्थान वेदत्रयी के उपरान्त हैं। इसकी गणना विश्व के ऐसे ग्रन्थों में की जाती है, जिनसे मानव ने वैयक्तिक आचरण और समाज रचना के लिए प्रेरणा प्राप्त की है। इसके प्रणेता या रचयिता कौन हैं, इस पर अनेक मत हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मनुस्मृति को सृष्टि के प्रथम राजा मनु द्वारा रचित प्रथम संविधान कहा है।
मनुस्मृति के पांचवें अध्याय के 148वें श्लोक में लिखा गया है कि एक लड़की हमेशा अपने पिता के संरक्षण में रहनी चाहिए, शादी के बाद पति उसका संरक्षक होना चाहिए, पति की मौत के बाद उसे अपने बच्चों की दया पर निर्भर रहना चाहिए, किसी भी स्थिति में एक महिला आजाद नहीं हो सकती। ये महिलाओं के बारे में मनुस्मृति की राय साफ तौर पर बताती है।
मनुस्मृति में दलितों और महिलाओं को लेकर भी ऐसे कई श्लोक लिखे गए हैं, जिसकी वजह से हमेशा बहस होते रहता है। मनुस्मृति में लिखी हुई बातों को लेकर पिछले कई सालों से विवाद होते रहे हैं। लेकिन क्या मनुस्मृति सच में इतनी विवादित किताब है?
इतिहासकार नरहर कुरंदकर के मुताबिक, स्मृति का अर्थ धर्मशास्त्र से है। इस वजह इसे मनु द्वारा लिखा गया धार्मिक लेख मनुस्मृति कहा जाता है। मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं, जिनमें 2684 श्लोक हैं। कुल संस्करणों में श्लोकों की संख्या 1964 हैं। मनुस्मृति पर कुरंदकर कई लेक्चर दे चुके हैं। उनके कुछ भाषणों के अंश को एक किताब की शक्ल दे दी गई है, जो मनुस्मृति के भीतर की दुनिया के बारे में विस्तार से बात करती है।
मनुस्मृति पर कुरुंदकर का विचार समझें तो उनका साफ कहना था कि मैं उन लोगों में शामिल हूं, जो इसे जलाने पर भरोसा करते हैं। करुंदकर का कहना था कि मनुस्मृति की रचना ईसा के जन्म से दो-तीन सौ वर्ष पहले शुरू हुई थी।
मनुस्मृति के पहले अध्याय में प्रकृति के निर्माण, चार युगों, चार वर्णों, उनके पेशों, ब्राह्मणों की महानता जैसे विषय शामिल हैं। दूसरा अध्याय ब्रह्मचर्य और अपने मालिक की सेवा पर अधारित है। तीसरे अध्याय में शादियों के प्रकार, विवाहों के रीति रिवाजों और श्राद्ध यानी पूर्वजों को याद करने का जिक्र है। चौथे अध्याय में गृहस्थ धर्म का वर्णन है, जिसमें खाने या न खाने के नियमों और 21 तरह के नरकों के बारे में बात की गई है।
इस किताब के पांचवे अध्याय में महिलाओं के कर्तव्यों, शुद्धता और अशुद्धता का वर्णन है। छठे अध्या में एक संत और सातवें अध्या में एक राजा के कर्तव्यों का जिक्र है। आठवें अध्याय में अपराध, न्याय, वचन और राजनीतिक मामले पर बात की गई है। नौवें अध्याय में पैतृक संपत्ति, दसवें अध्याय में वर्णों का मिश्रण, ग्यारहवें अध्याय में पापकर्म और बारहवें अध्याय में तीन गुणों और वेदों की प्रशंसा है।
पंजाब यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेशर राजीव लोचन के हवाले से बीबीसी ने लिखा कि जब अंग्रेज भारत में आए तो उन्हें लगा कि जैसे मुस्लिमों के पास कानून के रूप में शरिया है, उसी तरह हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति है। इसी वजह से उन्होंने इस किताब को आधार मानकर मुकदमों की सुनवाई शुरू कर दी। इसके साथ काशी के पंडितों ने अग्रेजों से अपील की कि वे मनुस्मृति को हिंदुओं का ग्रंथ बताकर इसका प्रचार-प्रसार करें। इसी वजह से यह धारणा बन गया कि मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है।
राजीव लोचन के मुताबिक, जब बुद्ध संघों की भारत में मौजूदगी तेजी से फैलने लगी थी, तब ब्राह्मणों ने प्रभुत्व कम होता देख इस किताब को लिखकर अपने प्रभुत्व को फिर से जमाने की कोशिश की। उन्होंने एक मिथक रचा कि समाज में ब्राह्मण की जगह सबसे ऊपर है और समाज में ब्राह्मण और दूसरे लोगों के लिए अलग-अलग नियम हैं।
वर्णों की अनुसार, यही कारण है कि ब्राह्मणों को कम सजा मिलती थी, लेकिन अन्य लोगों को कड़ी सजा का प्रावधान था। इस किताब में कहा गया कि किसी भी स्थिति में ब्राह्मणों का सम्मान होना चाहिए। किसी भी महिला का कल्याण तभी होगा, जब एक पुरुष का कल्याण हो। एक महिला का कोई धार्मिक अधिकार नहीं है। वह अपने पति की सेवा करके स्वर्ग प्राप्त कर सकती है।
मनुस्मृति में 'शूद्रों' को शिक्षा पाने का अधिकार नहीं था। उस वक्त शिक्षा का माध्यम मौखिक हुआ करती थी। यही कारण है कि कुछ ब्राह्मणों को छोड़कर किसी को ये नहीं पता था कि मनुस्मृति क्या है। ब्रिटिश काल में ये किताब कानूनी मामलों में इस्तेमाल के कारण चर्चाओं में आई। विलियम जोनास ने मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। जिसके बाद इस किताब के बारे में पता चला।
राजीव लोचन के मुताबिक, महात्मा ज्योतिबा फुले मनुस्मृति को चुनौती देने वाले पहले व्यक्ति थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 25 जुलाई, 1927 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले में (वर्तमान में रायगड) के महाड में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया। अपनी किताब 'फिलॉसफी ऑफ हिंदूइज्म' में वे लिखते हैं कि मनु ने चार वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी। मनु ने इन चार वर्णों को अलग-अलग बताकर जाति व्यवस्था की नींव रखी। हालांकि, ये नहीं कहा जा सकता है कि मनु ने जाति व्यवस्था की रचना की है। लेकिन उन्होंने इस व्यवस्था के बीज जरूर बोए थे।
मनुवाद का समर्थन करने वालों लोगों की संख्या भी कम नहीं है। मनुस्मृति के समर्थकों का एक गुट कहता हैं कि इस सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की थी और दुनिया का कानून प्रजापति-मनु-भृगु की परंपरा से आया है। ऐसे में इसका सम्मान किया जाना चाहिए। कुरुंदकर अपनी किताब में इसके बारे में बताते हैं कि मनुस्मृति का बचाव के लिए ये भी कहा जाता है कि स्मृतियां वेदों पर आधारित हैं। और मनुस्मृति भी वेदों के हिसाब से ही है।
इस वजह से इसे वेदों की तरह ही सम्मान मिलना चाहिए। शंकराचार्य के साथ-साथ दूसरे धर्मगुरुओं ने भी इसी आधार पर इसका बचाव किया। मनुस्मृति के आधुनिक समर्थक कहते हैं कि इस किताब के कुछ हिस्सों को छोड़ दिया जाए तो ये किताब समाज के कल्याण की बात करती है।