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नामक्कल हिंसा मामला: विजय की पार्टी के जिला सचिव की जमानत याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

TVK रैली के दौरान अस्पताल पर हमला मामले में हाईकोर्ट ने TVK नेता सतीश कुमार की जमानत याचिका ठुकरा दी। कोर्ट ने राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं की हरकतों की जिम्मेदारी लेने की नसीहत दी।

प्रतीक पाण्डेय

Tamil Nadu Stampede: तमिलनाडु के नामक्कल जिले में अभिनेता से राजनेता बने थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) की रैली के दौरान हुई हिंसा अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गई है। एक निजी अस्पताल पर कथित हमले के आरोप में TVK के जिला सचिव सतीश कुमार की अग्रिम जमानत याचिका मद्रास हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी के साथ खारिज कर दी है।

नामक्कल में थलपति विजय की चुनावी रैली के दौरान भगदड़ और अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो गई थी। इस दौरान घायल लोगों को पास के एक निजी अस्पताल में लाया गया, लेकिन इलाज में देरी की अफवाह से TVK समर्थक भड़क उठे। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, गुस्साए कार्यकर्ताओं ने अस्पताल परिसर में जबरन घुसने की कोशिश की, स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार किया और तोड़फोड़ की। इससे अस्पताल को लगभग 5 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

अदालत का कड़ा रुख: "नेतृत्व की जिम्मेदारी निभाएं"

TVK जिला सचिव सतीश कुमार द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता हिंसा करते हैं, तो पार्टी नेतृत्व यह नहीं कह सकता कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी। अदालत ने तीखे शब्दों में पूछा, "क्या आपको अपने कार्यकर्ताओं को नियंत्रण में रखना नहीं आता? क्या आप इस जिम्मेदारी से बच सकते हैं?"

लोकतंत्र को गलत संदेश

हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र और समाज में गंभीर रूप से गलत संदेश भेजती हैं। राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए और कानून व्यवस्था के उल्लंघन पर जवाबदेही तय करनी चाहिए।

पहले से दर्ज हैं आठ आपराधिक मामले

पुलिस ने अदालत को यह भी जानकारी दी कि सतीश कुमार के खिलाफ पहले से 8 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें सरकारी कार्य में बाधा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।

नामक्कल की यह घटना सिर्फ एक कानून व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि क्या नवगठित राजनीतिक दल अपने संगठन पर नियंत्रण रखने में सक्षम हैं। हाईकोर्ट की टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि लोकतंत्र में सत्ता के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है, और हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती।

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