Munshi Premchand Death Anniversary: महान लेखक और उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि गुरुवार को मनाई जाएगी। प्रेमचंद हिंदी और उर्दू साहित्य के दिग्गज थे, जिन्हें मशहूर बंगाली साहित्यकार शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि से सम्मानित किया था।
मुंशी प्रेमचंद को सिर्फ एक उपन्यासकार या कहानीकार कहना उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के दायरे को सीमित करने जैसा होगा। वे ऐसे लेखक थे जिन्होंने अपनी कलम के जरिए भारतीय समाज की कठोर सच्चाइयों को बहुत संवेदनशीलता और निडरता से उजागर किया। इसीलिए, जब भी हिंदी और उर्दू साहित्य के इतिहास की बात होगी, प्रेमचंद को ज़रूर याद किया जाएगा।
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले के लमही गांव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। हालांकि, शुरुआत में वे 'नवाब राय' उपनाम से लिखते थे। उनके पिता, मुंशी अजाब राय, एक पोस्टल क्लर्क थे और उनकी मां, आनंदी देवी, एक गृहिणी थीं।
एक आम बच्चे के बचपन के विपरीत, प्रेमचंद के शुरुआती साल काफी मुश्किलों और आर्थिक संघर्षों में बीते। जब वे सिर्फ सात साल के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया और सोलह साल की उम्र में उनके पिता भी गुज़र गए। इसके बाद, आर्थिक तंगी के कारण परिवार का भरण-पोषण करने और अपनी पढ़ाई पूरी करने में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा लमही और एक मदरसे में पूरी की, जहां उन्होंने उर्दू और फ़ारसी सीखी। बाद में, उन्होंने 1898 में मैट्रिक की परीक्षा पास की और 1919 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. की डिग्री हासिल की।
पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने स्कूल टीचर के तौर पर काम किया और बाद में शिक्षा विभाग में 'सब-डिप्टी इंस्पेक्टर' बने। हालांकि, 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद, उन्होंने 'हंस', 'माधुरी' और 'जागरण' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया और 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की।
'प्रेमचंद' नाम के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। शुरू में, वे 'नवाब राय' उपनाम से लिखते थे, लेकिन 1908 में जब उनकी लघु कथाओं का संग्रह 'सोज-ए-वतन' राष्ट्रवादी भावनाओं के कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया, तो उन्हें एक नया पेन-नेम (लेखक का नाम) अपनाना पड़ा। फिर उन्होंने 'प्रेमचंद' के नाम से लिखना शुरू किया। इसी नाम से वे अमर हो गए।
समय के साथ, उनके नाम के आगे सम्मानसूचक शब्द 'मुंशी' भी जुड़ गया। प्रेमचंद को बचपन से ही लिखने में गहरी रुचि थी। वे एक ऐसे साहित्यकार के रूप में उभरे जिन्होंने काल्पनिक दुनिया पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, समाज की कठोर और वास्तविक सच्चाइयों को अपनी कलम से चित्रित किया।
उनकी रचनाएं गरीब किसानों, दलितों, शोषितों और महिलाओं के जीवन के साथ-साथ उस समय प्रचलित विभिन्न सामाजिक बुराइयों का जीवंत चित्रण करती हैं। प्रेमचंद की कुछ प्रमुख रचनाओं में 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि', 'मंगलसूत्र', 'मानसरोवर', 'पंच परमेश्वर', 'ईदगाह', 'पूस की रात', 'ठाकुर का कुआं', 'दो बैलों की कथा', 'बड़े घर की बेटी', 'बूढ़ी काकी', 'नमक का दारोगा', 'सेवा सदन' और 'निर्मला' शामिल हैं, जो आज भी बेहद लोकप्रिय हैं।
उनके निजी जीवन की बात करें तो, प्रेमचंद ने 1895 में मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में पारिवारिक दबाव में शादी की थी। हालांकि, उनकी पहली शादी ज्यादा समय तक नहीं चली। इसके बाद, 1906 में उन्होंने एक बाल-विधवा शिवरानी देवी से शादी की। उनके तीन बच्चे थे।
प्रेमचंद की दूसरी पत्नी, शिवरानी देवी, जीवन के हर संघर्ष में उनके साथ खड़ी रहीं और उनकी मृत्यु के बाद, उन्होंने 'प्रेमचंद घर में' शीर्षक से उनकी जीवनी लिखी। प्रेमचंद का निधन 8 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में हुआ।