Mother Teresa Birth Anniversary: आन्येजे गोंजा बोयाजियू को दुनिया मदर टेरेसा के नाम से जानती है। उनका जन्म 26 अगस्त 1910 को स्कोप्जे में हुआ था, जो उस समय ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। आगे चलकर उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों, बीमारों, अनाथों और जरूरतमंद लोगों की सेवा में लगा दिया। भारत में उनके सेवा कार्यों ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई और दुनिया भर में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाने लगा।
मदर टेरेसा 1929 में भारत पहुंचीं और कोलकाता को अपने सेवा कार्यों का केंद्र बनाया। उन्होंने शहर की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले गरीबों और बेसहारा लोगों के बीच काम करना शुरू किया। उनका मानना था कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति की मदद करना ही मानवता की सच्ची सेवा है।
1950 में मदर टेरेसा ने कोलकाता में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य गरीब, बीमार, अनाथ और बेसहारा लोगों की मदद करना था। धीरे-धीरे संस्था का काम भारत के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ दुनिया के कई देशों तक फैल गया।
मदर टेरेसा ने खास तौर पर कुष्ठ रोगियों, अनाथ बच्चों, बेघर लोगों और गंभीर रूप से बीमार मरीजों की देखभाल पर ध्यान दिया। कोलकाता में उनका ‘निर्मल हृदय’ जरूरतमंद और गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए सेवा का प्रमुख केंद्र बना। उनकी सादगी और सेवा भावना ने लाखों लोगों को प्रभावित किया।
गरीबों और जरूरतमंदों के लिए किए गए उनके काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। 1979 में मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके बाद भारत सरकार ने 1980 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।
मदर टेरेसा का मानना था कि समाज में बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़े काम करने की जरूरत नहीं होती। छोटे-छोटे काम भी अगर प्यार और संवेदना के साथ किए जाएं, तो उनका बड़ा असर हो सकता है। उनकी यही सोच आज भी लोगों को सेवा और मानवता के लिए प्रेरित करती है।
मदर टेरेसा का निधन 5 सितंबर 1997 को कोलकाता में हुआ। उनके निधन के बाद भी ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के जरिए जरूरतमंदों की सेवा का काम जारी रहा। संस्था गरीबों को भोजन, कपड़े और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के साथ-साथ अनाथ और बेसहारा लोगों की देखभाल करती है।
मदर टेरेसा के जीवन और काम को लेकर कुछ विवाद और आलोचनाएं भी सामने आईं। कुछ लोगों ने उनके संगठन की कार्यप्रणाली और उनके सेवा मॉडल पर सवाल उठाए। इसके बावजूद गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए किए गए उनके लंबे समय के काम को दुनिया भर में व्यापक पहचान मिली।
मदर टेरेसा को कैथोलिक चर्च ने 2016 में संत की उपाधि दी। वेटिकन में आयोजित समारोह में उन्हें ‘सेंट टेरेसा ऑफ कलकत्ता’ के नाम से संत घोषित किया गया। इससे उनके धार्मिक और मानवीय कार्यों को एक बार फिर वैश्विक स्तर पर चर्चा मिली।
आज भी उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर कोलकाता सहित कई जगहों पर प्रार्थना सभाएं और सेवा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ और कई अन्य संस्थाएं गरीबों, बीमारों और जरूरतमंदों की मदद करती हैं। मदर टेरेसा का जीवन इस बात की मिसाल है कि किसी व्यक्ति की छोटी-सी कोशिश भी दूसरे के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। उनकी विरासत आज भी लोगों को जरूरतमंदों की मदद करने, दया रखने और मानवता को सबसे ऊपर रखने की प्रेरणा देती है।