पिछले दो दशकों में दिवाली घरों और मंदिरों से निकलकर वैश्विक सार्वजनिक आयोजनों तक पहुंची
न्यूयॉर्क में 2023 से दिवाली पर स्कूलों की छुट्टी ने सांस्कृतिक स्वीकार्यता का संकेत दिया
UNESCO ने 2025 में दीपावली को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कर महत्व बढ़ाया
Indian Festivals Worldwide: कभी भारतीय त्योहारों को विदेशों में रहने वाले भारतीय परिवारों और प्रवासी समुदायों तक सीमित माना जाता था। दिवाली हो या होली, इनका उत्सव मुख्य रूप से भारतीय मूल के लोग अपने घरों, मंदिरों और सामुदायिक केंद्रों में मनाते थे। लेकिन पिछले दो दशकों में तस्वीर काफी बदल चुकी है। आज भारतीय त्योहार दुनिया के कई देशों में सांस्कृतिक कैलेंडर का हिस्सा बन चुके हैं। कई जगह स्थानीय प्रशासन, स्कूल, कारोबारी संस्थान और विदेशी नागरिक भी इन उत्सवों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
सवाल यह है कि आखिर 2006 से 2026 के बीच ऐसा क्या बदला कि भारतीय त्योहारों को लेकर दुनिया का नजरिया पहले से कहीं ज्यादा सकारात्मक और व्यापक दिखाई देने लगा?
पिछले 20 सालों में दिवाली की वैश्विक पहचान में सबसे बड़ा बदलाव इसके सार्वजनिक आयोजनों में देखने को मिला है। ब्रिटेन के लीसेस्टर शहर में दिवाली का आयोजन इसका बड़ा उदाहरण है। यहां 1983 में कुछ रोशनियों के साथ शुरू हुआ आयोजन आज दुनिया के सबसे बड़े दिवाली समारोहों में शामिल है।
अब शहर में करीब दो सप्ताह तक सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत, नृत्य और रोशनी के आयोजन होते हैं। लीसेस्टर सिटी काउंसिल के अनुसार, यहां दिवाली से जुड़े लगभग 50 कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
अमेरिका में भी दिवाली की स्वीकार्यता बढ़ी है। न्यूयॉर्क में दक्षिण एशियाई समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद 2023 में पहली बार दिवाली के अवसर पर सरकारी स्कूलों में छुट्टी घोषित की गई। यह बदलाव सिर्फ एक छुट्टी का फैसला नहीं था, बल्कि अमेरिकी समाज में भारतीय और दक्षिण एशियाई समुदाय की बढ़ती सांस्कृतिक उपस्थिति का संकेत भी था।
दिवाली को लेकर दुनिया के नजरिये में दूसरा बड़ा बदलाव यह है कि अब इसे सिर्फ हिंदू या भारतीय त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि रोशनी, उम्मीद और सकारात्मकता के सांस्कृतिक उत्सव के तौर पर भी देखा जाने लगा है।
ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर जैसे देशों में दिवाली के सार्वजनिक आयोजनों में गैर-भारतीय नागरिकों की भागीदारी भी बढ़ी है। कई जगह स्कूलों में बच्चों को दिवाली की कहानियों, रंगोली, दीयों और भारतीय परंपराओं के बारे में बताया जाता है।
मलेशिया, मॉरीशस, फिजी और सिंगापुर जैसे देशों में तो दिवाली लंबे समय से सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रही है। इन देशों में भारतीय मूल के समुदायों की ऐतिहासिक मौजूदगी ने त्योहार को स्थानीय संस्कृति से भी जोड़ा है।
दिवाली के साथ होली की लोकप्रियता भी भारत की सीमाओं से बाहर पहुंची है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप के कई शहरों में होली के सार्वजनिक आयोजन, रंगोत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
हालांकि विदेशों में आयोजित होने वाले सभी होली कार्यक्रम पारंपरिक धार्मिक उत्सव नहीं होते। कई आयोजन संगीत, रंगों और भारतीय खानपान पर आधारित सांस्कृतिक उत्सव के रूप में आयोजित किए जाते हैं। इससे भारतीय संस्कृति को उन लोगों तक पहुंचने का मौका मिला है, जिनका भारत या भारतीय समुदाय से सीधा संबंध नहीं है।
इस बदलाव के पीछे भारतीय प्रवासी समुदाय की भूमिका बेहद अहम रही है। विदेशों में बसे भारतीयों ने सिर्फ अपनी परंपराओं को जीवित नहीं रखा, बल्कि उन्हें नई पीढ़ियों और स्थानीय समाज तक भी पहुंचाया।
पहले त्योहारों का आयोजन मुख्य रूप से घरों और धार्मिक स्थलों तक सीमित रहता था। धीरे-धीरे सामुदायिक आयोजन शुरू हुए, फिर स्थानीय प्रशासन और सांस्कृतिक संस्थाएं भी इनसे जुड़ने लगीं।
इस प्रक्रिया ने भारतीय त्योहारों को एक नई पहचान दी। अब ये आयोजन प्रवासी भारतीयों के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम होने के साथ-साथ दूसरे समुदायों के साथ सांस्कृतिक संवाद का अवसर भी बन गए हैं।
भारतीय त्योहारों की अंतरराष्ट्रीय पहचान के लिहाज से दिसंबर 2025 भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। UNESCO ने दीपावली को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया।
यह मान्यता दीपावली को केवल एक धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं, पारिवारिक संबंधों, सामुदायिक एकता और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी पहचान देती है। इससे दुनिया के सामने भारतीय त्योहारों के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने का एक नया अवसर मिला।
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि दुनिया के हर देश में भारतीय त्योहारों को समान स्तर पर स्वीकार्यता मिल गई है। कई जगह ये उत्सव अब भी मुख्य रूप से भारतीय प्रवासी समुदायों तक सीमित हैं। कुछ देशों में आतिशबाजी, सार्वजनिक आयोजनों और धार्मिक प्रतीकों को लेकर अलग-अलग तरह की चुनौतियां भी सामने आती हैं। लेकिन पिछले 20 सालों के घटनाक्रम यह जरूर दिखाते हैं कि भारतीय त्योहारों की वैश्विक दृश्यता और सांस्कृतिक स्वीकार्यता में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।
2006 के आसपास विदेशों में भारतीय त्योहारों की पहचान मुख्य रूप से प्रवासी भारतीयों के उत्सव के रूप में थी। 2026 तक आते-आते कई देशों में ये सार्वजनिक समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रम और स्थानीय उत्सवों का हिस्सा बन चुके हैं। दिवाली की रोशनी, होली के रंग और भारतीय परंपराओं की विविधता ने दुनिया के अलग-अलग समाजों में अपनी जगह बनाई है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि आज भारतीय त्योहार सिर्फ भारत की सांस्कृतिक पहचान नहीं रह गए हैं, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक माध्यम भी बन रहे हैं।