Polymer Currency Notes in India: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जल्दी ही देश में प्लास्टिक के नोट चलाने की तैयारी कर रही है। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में बताया कि 10 और 20 रुपये के पॉलिमर (प्लास्टिक) नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी गई है। इसके तहत करीब 3,000 करोड़ रुपये मूल्य के 200 करोड़ नोट बाजार में उतारे जाएंगे। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का मानना है कि इससे नोट अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और लंबे समय तक इस्तेमाल के लायक बनेंगे। अगर ट्रायल सफल रहा तो भविष्य में अन्य मूल्य के नोट भी पॉलिमर में छापे जा सकते हैं। आइए आपको बताते हैं कि सरकार ने अचानक देश में प्लास्टिक के नोट जारी करने का फैसला क्यों लिया? इसका ऑस्ट्रेलिया से क्या संबंध है? और इसके क्या फायदे और नुकसान हैं?
प्लास्टिक नोटों की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया में हुई थी। साल 1966 में वहां नई करेंसी जारी होने के कुछ ही महीनों बाद 10 डॉलर के नकली नोट बड़ी संख्या में बाजार में पहुंच गए। हैरानी की बात यह थी कि यह काम किसी बड़े गिरोह ने नहीं, बल्कि एक फोटोग्राफर, एक कलाकार, एक दर्जी और एक दुकानदार ने मिलकर किया था। इस घटना के बाद ऑस्ट्रेलिया के केंद्रीय बैंक ने वैज्ञानिकों से ऐसा नोट बनाने को कहा जिसकी नकल करना बेहद मुश्किल हो। करीब 20 साल के शोध के बाद 1988 में दुनिया का पहला पॉलिमर नोट जारी किया गया।
पॉलिमर नोट सामान्य प्लास्टिक से नहीं बनते हैं। इनके निर्माण में 'बाय-एक्सिअली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन' (BOPP) नाम के खास पॉलिमर का इस्तेमाल होता है। यह पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से तैयार किया जाता है। इसे काफी मजबूत, लचीला और टिकाऊ माना जाता है। यही वजह है कि पॉलिमर नोट आसानी से फटते नहीं हैं और लंबे समय तक अपना आकार बनाए रखते हैं।
भारत में प्लास्टिक नोट लाने की योजना नई नहीं है। RBI ने पहली बार 2009 में इसका प्रस्ताव दिया था। इसके बाद 2012 में तत्कालीन सरकार ने 10 रुपये के पॉलिमर नोटों के ट्रायल को मंजूरी दी थी। कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला जैसे शहरों में अलग-अलग मौसम के मुताबिक इनकी जांच की योजना बनाई गई थी। हालांकि 2016 की नोटबंदी और एटीएम मशीनों में बदलाव की जरूरत के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब सरकार ने इसे फिर से शुरू करने का फैसला किया है।
RBI के मुताबिक, पॉलिमर नोट कागज के नोटों की तुलना में 2 से 6 गुना अधिक समय तक चल सकते हैं। ये पानी, नमी, तेल और धूल-मिट्टी से आसानी से खराब नहीं होते। बार-बार मोड़ने पर भी इनके फटने की संभावना कम रहती है। जब ये पूरी तरह इस्तेमाल लायक नहीं रहते, तब इन्हें रिसाइकिल कर नए उत्पाद या नए नोट बनाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
पॉलिमर नोटों को छापने की शुरुआती लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। विशेषज्ञों के अनुसार इनकी प्रिंटिंग लागत करीब 30 से 60 प्रतिशत तक ज्यादा हो सकती है। लेकिन ये काजग के नोटों के मुकाबले लंबे समय तक चलता है,इसके कारण बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम पड़ती है। यही वजह है कि लंबे समय में सरकार की कुल लागत घट जाती है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने पॉलिमर नोट अपनाकर वर्षों में बड़ी बचत दर्ज की है।
प्लास्टिक नोटों का सबसे बड़ा फायदा उनकी सुरक्षा है। इनमें पारदर्शी विंडो, विशेष स्याही, माइक्रो प्रिंटिंग और कई आधुनिक सुरक्षा फीचर जोड़े जा सकते हैं। इनकी नकल करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक और भारी निवेश की जरूरत होती है। यही कारण है कि जिन देशों ने पॉलिमर नोट अपनाए हैं, वहां नकली नोटों के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
हालांकि पॉलिमर नोटों के कई फायदे हैं, लेकिन इन्हें पूरी तरह लागू करना आसान नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती एटीएम, नोट गिनने वाली मशीनों और कैश हैंडलिंग सिस्टम को नए नोटों के अनुरूप अपडेट करना है। इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत पड़ेगी। इसके अलावा, विशेषज्ञों का कहना है कि समय के साथ अपराधी नई तकनीकों जैसे 3D प्रिंटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर नकली पॉलिमर नोट बनाने की कोशिश भी कर सकते हैं।
फिलहाल भारत में केवल 10 और 20 रुपये के पॉलिमर नोटों का फील्ड ट्रायल किया जाएगा। इस दौरान उनकी मजबूती, सुरक्षा और व्यवहारिक उपयोग का आकलन किया जाएगा। यदि परिणाम संतोषजनक रहे, तो भविष्य में 50, 100 और 500 रुपये के नोट भी पॉलिमर में जारी किए जा सकते हैं। हालांकि पूरे देश में कागजी नोटों की जगह प्लास्टिक नोट लाने की प्रक्रिया पूरी होने में कई साल लग सकते हैं।
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प्लास्टिक नोटों की शुरुआत भारतीय मुद्रा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकती है। इससे नोटों की उम्र बढ़ेगी, नकली करेंसी पर नियंत्रण मजबूत होगा और लंबे समय में छपाई की लागत भी कम हो सकती है। हालांकि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ट्रायल कितना सफल रहता है और देश का बैंकिंग तथा एटीएम ढांचा इस बदलाव के लिए कितनी तेजी से तैयार हो पाता है।