आजाद भारत की 8वीं जनगणना
देश में पहली बार जाति आधारित जनगणना
साल 2027 में होने जा रही जनगणना देश की पहली डिजीटल जनगणना है
The country First Digital Census: जनगणना किसी भी देश की स्थिति के बारे में जानने का एक महत्पूर्ण माध्यम है। इसके द्वारा केवल आबादी की गणना नहीं होती बल्कि देश की आर्थिक नीतियों, सामाजिक समीकरणों और विकास की प्राथमिकताओं को तय करने का महत्वपूर्ण आधार है। देश की जनगणना का डाटा होने के बाद सरकार को विकास कार्यों और जनता के लिए विकास की रूप रेखा तैयार करने में मदद मिलती है।
सरकार को यह समझने में मदद मिलेगी कि किन क्षेत्रों जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की सबसे ज्यादा जरूरत है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी और विविधता वाले देश भारत के लिए जनगणना का महत्व लगातार बढ़ते जा रहा है।
देश की आबादी, परिवारों की स्थिति, आवास, शिक्षा और सामाजिक संरचना से जुड़े आंकड़े सरकार को नीतियां बनाने में मदद करते हैं। यही वजह है कि आगामी जनगणना को केवल जनसंख्या का रिकॉर्ड तैयार करने के बजाय भविष्य के भारत की विकास योजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। साल 2027 में होने जा रही जनगणना देश की पहली डिजीटल जनगणना है। हर 10 वर्षों में होने वाली ये जनगणना देश की 16वीं तथा स्वतंत्र भारत की 8वीं जनगणना है।
जब भी देश में जनगणना होता है तो सरकार को ग्रामीण और शहरी आबादी, परिवारों की स्थिति, आवास, शिक्षा और सामाजिक संरचना की जानकारी मिलती है। इसके आधार पर स्कूलों, अस्पतालों, पेयजल, आवास और परिवहन जैसी सुविधाओं की जरूरत का बेहतर आकलन किया जा सकता है।
इन आंकड़ों से विकास योजनाओं की प्राथमिकताएं तय करने में मदद मिलेगी। हालांकि, सरकारी योजनाओं का बजट और लाभार्थियों की संख्या केवल जनगणना पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आय, गरीबी, पात्रता और अन्य प्रशासनिक आंकड़ों को भी ध्यान में रखा जाता है।
देश में पहली बार जाति आधारित जनगणना की घोषणा हुई है। देश में जनगणना दो चरणों में होगी। जनगणना में जातिगत आंकड़ों का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण चर्चाओं में शामिल है। इन आंकड़ों से विभिन्न सामाजिक समूहों की जनसंख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है। इसका असर सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों के विकास और आरक्षण से जुड़ी बहसों पर पड़ सकता है।
जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन करना परिसीमन कहलाता है, जिससे हर एक वोट का मूल्य समान बना रहे। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन किया जाता है।
जनगणना के बाद विधानसभा और लोकसभा की सीटे बढ़ती है। इसको लेकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दाव-पेच भी तेज हो जाता है। इसको लेकर राज्यों में डर भी देखने को मिलता है। जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर काम किया उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी घटने का डर सताता है।
जनगणना-2027 में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे आंकड़ों के संग्रह और विश्लेषण में मदद मिल सकती है। लेकिन सटीक गणना, निजता की सुरक्षा और दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंच सुनिश्चित करना सरकार के सामने बड़ी चुनौती होगी।
सरकार ने जनगणना 2027 के लिए ₹11,718.24 करोड़ का महत्वपूर्ण बजटीय प्रावधान किया है, एक मजबूत संस्थागत ढांचे के साथ-साथ जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण और प्री-टेस्ट जैसी व्यापक प्रशासनिक तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं, ताकि पूरे देश में इस डिजिटल अभियान का निष्पादन पूरी सुगमता के साथ सुनिश्चित किया जा सके।
देश में पहली बार जाति आधारित जनगणना हो रही है। जातिगत जनगणना के बाद ओबीसी की वास्तविक संख्या सामने आएगी। यदि किसी वर्ग की आबादी उनकी मौजूदा आरक्षण सीमा से बहुत अधिक पाई जाती है, तो राजनीतिक दल और संगठन 50% की सीमा को हटाने या बढ़ाने की मांग कर सकते हैं।