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CAG रिपोर्ट नहीं केजरीवाल का कच्चा चिट्ठा है! 166 पन्नों में शराब घोटाले की पूरी कहानी, यहां समझिए घोटाले का घटनाक्रम

कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि आम आदमी पार्टी सरकार के दौरान शराब नीति में कई अनियमितताएं हुईं, जिसके कारण सरकारी खजाने को 2002.68 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

अभिषेक सिंह

नई दिल्ली: दिल्ली सरकार ने शराब घोटाले पर कैग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश कर दी है। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि आम आदमी पार्टी सरकार के दौरान शराब नीति में कई अनियमितताएं हुईं, जिसके कारण सरकारी खजाने को 2002.68 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

इस मामले की जांच सीबीआई और ईडी पहले से ही कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया समेत आम आदमी पार्टी के कई नेताओं को आरोपी बनाया गया है। केजरीवाल और सिसोदिया को महीनों जेल में रहना पड़ा और फिलहाल वे जमानत पर हैं। कैग की रिपोर्ट से उनकी मुश्किलें फिर बढ़ सकती हैं।

1. राजस्व को 2,002.68 करोड़ रुपये का भारी नुकसान: 166 पन्नों की कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि आप सरकार के दौरान लागू की गई शराब नीति से विभिन्न कारणों से सरकारी खजाने को 2000.68 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

  • गैर-अनुकूल क्षेत्रों में खुदरा दुकानें नहीं खोलने से 941.53 करोड़
  • सरेंडर लाइसेंसों का दोबारा टेंडर न किए जाने से 890 करोड़
  • कोविड-19 का हवाला देते हुए आबकारी विभाग की सलाह के बावजूद जोनल लाइसेंस धारकों को शुल्क में छूट दिए जाने से 144 करोड़
  • जोनल लाइसेंस धारकों से उचित सुरक्षा जमा न लिए जाने से सरकारी खजाने को 27 करोड़ का नुकसान हुआ।

2. लाइसेंस उल्लंघन: कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि नवंबर 2021 से सितंबर 2022 के दौरान सरकार दिल्ली आबकारी नियम 2010 के नियम 35 को लागू करने में विफल रही, जिसके कारण ऐसे थोक विक्रेताओं को लाइसेंस दिए गए जो विनिर्माण में रुचि रखते थे या खुदरा विक्रेताओं से उनके संबंध थे। इसके कारण पूरी आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई।

3. थोक विक्रेताओं का लाभ मार्जिन 5% से बढ़ाकर 12% करना: कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि आम आदमी पार्टी सरकार ने थोक विक्रेताओं का लाभ मार्जिन 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर दिया। जिससे थोक लाइसेंसधारियों का मुनाफ़ा तो बढ़ गया, लेकिन सरकारी राजस्व में गिरावट आई।

4. कोई जाँच नहीं, अग्रिम लागतों की अनदेखी: रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने आवेदकों की सॉल्वेंसी, वित्तीय विवरण और आपराधिक रिकॉर्ड सहित किसी भी उचित जाँच के बिना खुदरा शराब लाइसेंस जारी किए। शराब क्षेत्र चलाने के लिए 100 करोड़ रुपये से अधिक के शुरुआती निवेश की आवश्यकता थी, फिर भी कोई वित्तीय पात्रता मानदंड निर्धारित नहीं किया गया था।

5. विशेषज्ञों की सिफारिशों की अनदेखी: कैग ने कहा है कि आप सरकार ने 2021-22 की आबकारी नीति से संबंधित अपनी ही विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को बिना किसी औपचारिक स्पष्टीकरण के खारिज कर दिया।

6. पारदर्शिता की कमी, कमजोर निगरानी और शराब कार्टेल का निर्माण: रिपोर्ट में कहा गया है कि नई नीति के तहत एक ही आवेदक को 54 शराब की दुकानें संचालित करने की अनुमति दी गई, जबकि पहले यह सीमा केवल 2 थी। इससे शराब बाजार में एकाधिकार और कार्टेलाइजेशन को बढ़ावा मिला। पहले 377 खुदरा दुकानें सरकारी निगमों और 262 निजी व्यक्तियों द्वारा संचालित की जाती थीं। नई नीति ने 849 दुकानों के साथ 32 खुदरा क्षेत्र बनाए, लेकिन लाइसेंस केवल 22 निजी कंपनियों को दिए गए।

7. एकाधिकार को बढ़ावा और ब्रांड को आगे बढ़ाने की रणनीति: आप सरकार की नीति ने निर्माताओं को केवल एक थोक विक्रेता के साथ अनुबंध करने के लिए मजबूर किया। दिल्ली में पंजीकृत 367 भारतीय निर्मित विदेशी शराब ब्रांडों में से केवल 25 ब्रांडों की कुल शराब बिक्री में लगभग 70% हिस्सेदारी थी। केवल तीन थोक विक्रेताओं - इंडोस्पिरिट, महादेव लिकर और ब्रिंडको - ने आपूर्ति के 71% से अधिक हिस्से को नियंत्रित किया।

8. कैबिनेट प्रक्रियाओं का उल्लंघन: सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि कई प्रमुख छूट और रियायतें कैबिनेट की मंजूरी या उपराज्यपाल के परामर्श के बिना दी गईं, जो कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन है।

9. आवासीय और मिश्रित भूमि उपयोग क्षेत्रों में अवैध शराब की दुकानें: सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि आप सरकार के आबकारी विभाग ने एमसीडी या डीडीए से आवश्यक अनुमति के बिना आवासीय या मिश्रित भूमि उपयोग क्षेत्रों में शराब की दुकानें खोलने की अनुमति दी। निरीक्षण दलों ने जोन 23 में 4 दुकानों को गलत तरीके से व्यावसायिक क्षेत्र के रूप में दिखाया।

10. शराब की कीमतों में पारदर्शिता का अभाव: आबकारी विभाग ने एल1 लाइसेंसधारियों को महंगी शराब की एक्स-डिस्टिलरी कीमत (ईडीपी) खुद तय करने की अनुमति दी, जिससे कीमतों में हेराफेरी संभव हो गई।

11. जांच नियमों का उल्लंघन: जनता को जोखिम में डाला गयासीएजी ने यह भी कहा है कि गुणवत्ता की ठीक से जांच न करके लोगों की जान जोखिम में डाली गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि आबकारी विभाग ने गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट के बिना या यहां तक ​​कि बीआईएस (भारतीय मानक ब्यूरो) मानकों का पालन न करने पर भी लाइसेंस जारी किए।

कुछ परीक्षण रिपोर्ट ऐसी प्रयोगशालाओं से आईं जो एनएबीएल से मान्यता प्राप्त नहीं थीं। विदेशी शराब की जांच के 51% मामलों में रिपोर्ट या तो 1 साल से पुरानी थी, या फिर गायब थी या फिर उस पर तारीख नहीं थी। भारी धातुओं, मिथाइल अल्कोहल आदि जैसे हानिकारक पदार्थों की रिपोर्ट या तो अनुपस्थित थी या फिर उसे नजरअंदाज कर दिया गया, जिससे सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चिंताएं पैदा हो गई।

12. अवैध शराब की तस्करी पर कमजोर कार्रवाई: आबकारी खुफिया ब्यूरो (ईआईबी) ने देशी शराब की तस्करी पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की, जबकि जब्त किए गए स्टॉक में 65% देशी शराब थी।

13. कमजोर डेटा प्रबंधन और अवैध शराब व्यापार को बढ़ावा: आबकारी विभाग ने अधूरे और बिखरे हुए रिकॉर्ड रखे, जिससे राजस्व हानि और तस्करी के पैटर्न को ट्रैक करना असंभव हो गया।

14. आबकारी नीति का उल्लंघन करने वालों पर नो एक्शन: सीएजी ने कहा है कि आप सरकार कानून तोड़ने के लिए शराब लाइसेंसधारियों को दंडित करने में विफल रही।

15. सुरक्षा लेबल परियोजना की जगह पुराने तरीकों का इस्तेमाल: आबकारी चिपकने वाला लेबल परियोजना को लागू नहीं किया गया, जिससे आपूर्ति श्रृंखला धोखाधड़ी के लिए असुरक्षित हो गई।

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