डीवाई चंद्रचूड़(फोटो- नवभारत) 
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डीवाई चंद्रचूड़ की वो टिप्पणी जिससे मस्जिदों पर छाए संकट के बादल, वर्शिप एक्ट को लेकर वरिष्ठ वकीलों की क्या है राय?

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (Dhananjay Yashwant Chandrachud), कार्यकाल खत्म होने के बाद भी चर्चा में बने हुए हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए इन्होंने अपनी कार्यशैली...

Saurabh Pal

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (Dhananjay Yashwant Chandrachud), कार्यकाल खत्म होने के बाद भी चर्चा में बने हुए हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए इन्होंने अपनी कार्यशैली, बयानों और इंटरव्यू को लेकर खूब सुर्खियां बटोरीं, लेकिन उनकी वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद विवाद की सुनवाई के दौरान एक टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई है। ऐसी चर्चा है कि उनकी एक टिप्पणी से देश की तमाम प्रचीन मस्जिदों के पूर्व में मंदिर होने का दावा किया जा रहा है।

इसको लेकर कुछ जगह उनकी तारीफ हो रही है तो कुछ लोग अलोचना भी कर रहे हैं। डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल के दौरान कई बड़े फैसले लिए हैं। इस दौरान उनके द्वारा की गई टिप्पणियां अखबारों की मुख्य खबर भी रहीं हैं।

वर्शिप एक्ट पर चंद्रचूड़ की टिप्पणी

ऐसी ही एक टिप्पणी उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद विवाद की सुनवाई के दौरान की थी। उन्होंने कहा था कि प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 (उपासना स्थल अधिनियम) 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार, किसी भी संरचना के धार्मिक चरित्र की “जांच करने” पर रोक नहीं लगाता है। चीफ जस्टिस की इस मौखिक टिप्पणी की बुनियाद पर आज भारतीय अदालतों में मस्जिदों के सर्वे कराने की मांग वाली याचिकाओं की झड़ी लग गई है।

अब तक इन धर्मस्थलों के खिलाफ सर्वे की हुई मांग

मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद, वराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद के बाद संभल की शाही मस्जिद में निचली अदालत ने सर्वे का आदेश दिया है। इसके अलावा अजमेर की निजली अदालत ने अजमेर शरीफ (ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह) में सर्वे की मांग वाली याचिका कोर्ट ने स्वीकर कर ली है। इन दोनों धर्मस्थलों के अलावा बदायूं की एक मस्जिद व दिल्ली की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद में भी सर्वे कराने की तैयारी चल रही है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील का क्या कहना है ?

अजमेर व संभल की निचली अदालतों ने अजमेर दरगाह व संभल की शाही मस्जिद में सर्वे का आदेश देकर कानूनी जानकारों को निराश किया है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बीबीसी से कहा कि एक मौखिक टिप्पणी (तत्कालीन सीजेआई की) क़ानून नहीं बन सकती।” इसके अलावा वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े का कहना है कि वर्शिप एक्ट के संभल और अजमेर मामलों की सुनवाई को शुरुआत में ही ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए था।”

वर्शिप एक्ट में क्या है ?

उपासना स्थल अधिनियम उस समय अस्तित्व में आया, जब राम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था। सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम को संवैधानिक मान्यता देते हुए इसे वैध ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अधिनियम दर्शाता है, “इतिहास और उसकी ग़लतियों का इस्तेमाल वर्तमान और भविष्य को दबाने के हथियार के रूप में नहीं किया जाएगा”

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