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Caste Census: आजादी मिली और बदल गई जातिगत जनगणना, 2011 के आंकड़ों में हुई थी भारी गड़बड़ी

देश को आजादी मिलने के बाद सबसे पहले साल 1951 में जातिगत जनगणना कराया गया था। 1951 के जातिगत जनगणना को केवल अनुसूचित जातियों (SC) और जनजातियों (ST) तक सीमित कर दिया गया।

विकास कुमार उपाध्याय

नवभारत डिजिटल डेस्क : मौजूदा समय में जातिगत जनगणना को लेकर हर तरफ चर्चाएं तेज हो गई हैं। जातिगत जनगणना का विषय इन दिनों स्पॉटलाइट बना हुआ है। जातिगत जनगणना को लेकर सियासी खिचड़ी पकनी शुरू हो गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस साल के अंत में बिहार विधानसभा चुनाव होना है। इसके बाद बंगाल, असम, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव होने हैं।

पर जातिगत जनगणना का लॉन्ग टर्म में क्या असर पड़ेगा ये तो कास्ट सेंसस कराने के बाद ही पता चलेगा। पर आज के इस लेख में जानेंगे कि आजादी मिलने के बात जातिगत जनगणना का ट्रेंड कैसे बदला। इसके साथ ही यह भी जानेंगे कि आखिरी जातिगत जनगणना के आंकड़ों में क्या कुछ गड़बड़ी हुई थी, तो इसके लिए पढ़ते जाएं इस आर्टिकल को अंत तक।

आजादी के पहले आखिरी जातिगत जनगणना साल 1931 में कारई गई थी। उस वक्त संयुक्त हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा आबादी हिंदुओं की थी। वर्ष 1931 में कुल 35.2 करोड़ की आबादी में 22 करोड़ 44 लाख हिंदू थे। ये हिंदुओं का आंकड़ा कुल आबादी का लगभग 65 प्रतिशत था। वहीं मुसलमानों की आबादी की बात करें, तो 3 करोड़ 58 लाख था, जो कुल आबादी का 10 प्रतिशत ही था।

आजादी मिली और कास्ट सेंसस का बदल गया ट्रेंड

देश को आजादी मिलने के बाद सबसे पहले साल 1951 में जातिगत जनगणना कराया गया था। 1951 के जातिगत जनगणना को केवल अनुसूचित जातियों (SC) और जनजातियों (ST) तक सीमित कर दिया गया। अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC और सामान्य वर्ग की जातियों की गिनती बंद कर दी गई। तब से यही व्यवस्था आगे की जनगणनाओं में भी जारी रखी गई।

SECC हुआ पर आंकड़े सार्वजनिक नहीं हुए

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साल 2010 में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने लोकसभा में आश्वासन दिया था कि जातिगत जनगणना पर कैबिनेट में विचार किया जाएगा। इसके बाद सरकार ने SECC यानी Socio Economic and Caste Census के नाम से वर्ष 2011 कास्ट सेंसस कराने का काम किया था। 2011 में यूपीए सरकार के दौर में पहली बार सामाजिक-आर्थिक जातिगत सर्वे कराया गया था। ध्यान देने वाली बात यह रही कि इसके आंकड़े बाहर नहीं आए। उस समय लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ने जातिगत जनगणना कराने की मांग उठाई थी।

2011 के कास्ट सेंसस में सुप्रीम कोर्ट ने निकाली थी गड़बड़ियां

2011 के कास्ट सेंसस के आकंड़ों में बड़ी गड़बडी पाई गई थी। साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा था कि 2011 के आंकड़ों में काफी गड़बड़ियां हैं। डेटा कलेक्शन में अनेक प्रकार की त्रुटियां और डुप्लिकेशन की शिकायतें थीं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में जहां SC, ST और OBC मिलाकर 494 जातियां हैं, वहां SECC 2011 के डेटा में 4,28,677 जातियां बताई गई थी।

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