यादव जी की लव स्टोरी के खिलाफ दायर याचिका खारिज (फोटो- सोशल मीडिया)  
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‘यादव जी की लव स्टोरी’ पर रोक से इनकार, सुप्रीम कोर्ट बोला- फिल्म के शीर्षक से किसी जाति का अपमान नहीं

Supreme Court Decision: सुप्रीम कोर्ट ने यादव जी की लव स्टोरी के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्जल भुइयां की बेंच ने आशंका के आधार पर रोक लगाने से इनकार किया।

सोनाली झा

Yadav Ji Ki Love Story Case: फिल्म 'यादव जी की लव स्टोरी' के खिलाफ दाखिल याचिका को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि फिल्म का शीर्षक एक विशेष जाति को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है और इससे समुदाय की भावनाएं आहत हो सकती हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

मामले की सुनवाई जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने की। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का अवलोकन करने के बाद उन्हें ऐसा नहीं लगा कि फिल्म का शीर्षक यादव समुदाय को नकारात्मक या अपमानजनक तरीके से दर्शाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आशंका के आधार पर किसी फिल्म के शीर्षक को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।

घूसखोर पंडत से अलग है ये मामला

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता की मुख्य आपत्ति फिल्म के नाम को लेकर है, जबकि शीर्षक में कहीं भी जाति के प्रति अपमानजनक संकेत नहीं मिलता। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मामला पूर्व में चर्चित फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ से अलग है, जहां कथित तौर पर एक समुदाय को भ्रष्ट बताने का आरोप था। वर्तमान मामले में फिल्म की कहानी काल्पनिक बताई गई है और इसे लेकर अत्यधिक विरोध उचित नहीं है।

याचिकाकर्ता अवधेश यादव की दलील

याचिकाकर्ता अवधेश यादव की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि 'यादव जी की लव स्टोरी' 27 फरवरी को रिलीज होने वाली है और यदि रिलीज के बाद कुछ आपत्तिजनक सामग्री पाई जाती है तो उन्हें दोबारा कोर्ट आने की अनुमति दी जाए। इस पर अदालत ने कहा कि कानून में पहले से ही ऐसे प्रावधान मौजूद हैं, जिनके तहत आपत्तिजनक सामग्री होने पर उचित कदम उठाए जा सकते हैं। फिलहाल शीर्षक के आधार पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से फिल्म की रिलीज का रास्ता साफ हो गया है। अब यह फिल्म तय तारीख पर सिनेमाघरों में रिलीज होगी। अदालत के इस निर्णय को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि केवल आशंका के आधार पर रचनात्मक अभिव्यक्ति पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

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