मनोज कुमार (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)  
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मनोज कुमार ने दिलीप कुमार से प्रेरित होकर बदला नाम, एक लड़की की फटकार के बाद हमेशा के लिए छोड़ी सिगरेट

Manoj Kumar Birth Anniversary: मनोज कुमार ने एक समय सिगरेट की लत पाल रखी थी। लेकिन रेस्टोरेंट में एक अनजान लड़की ने उन्हें भारत होकर सिगरेट पी रहे हैं कहकर टोका, जिसके बाद उन्होंने धूम्रपान छोड़ दिया।

सोनाली झा

Manoj Kumar Birth Anniversary Special Story: अभिनेता मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था। उनका असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। फिल्मों के प्रति उनका लगाव बचपन से था और वह अभिनेता दिलीप कुमार के बड़े प्रशंसक थे। फिल्म ‘शबनम’ देखने के बाद उन्होंने उसमें दिलीप कुमार के किरदार ‘मनोज’ से प्रेरित होकर अपना नाम बदलकर मनोज कुमार रख लिया।

उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान और क्रांति जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने भारतीय संस्कृति और देशप्रेम को बड़े पर्दे पर नई पहचान दी। यही वजह रही कि दर्शकों ने उन्हें प्यार से भारत कुमार कहना शुरू कर दिया। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब उन्हें सिगरेट पीने की आदत थी। यह लत किसी डॉक्टर की सलाह या परिवार के दबाव से नहीं, बल्कि एक अनजान लड़की की डांट के बाद हमेशा के लिए छूट गई।

शहीद और उपकार ने दिलाई अलग पहचान

साल 1957 में फिल्म फैशन से अभिनय की शुरुआत करने वाले मनोज कुमार को असली पहचान 1965 में आई ‘शहीद’ से मिली, जिसमें उन्होंने भगत सिंह की भूमिका निभाई। इसके बाद 1967 में रिलीज हुई ‘उपकार’ ने उन्हें देशभक्ति फिल्मों का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया। यह फिल्म तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे ‘जय जवान, जय किसान’ से प्रेरित थी।

एक लड़की की बात ने छुड़वाई सिगरेट

मनोज कुमार ने एक इंटरव्यू में बताया था कि एक दिन वह परिवार के साथ एक रेस्टोरेंट में बैठे सिगरेट पी रहे थे। तभी एक छोटी लड़की उनके पास आई और बोली कि आप भारत होकर सिगरेट पी रहे हैं, आपको शर्म नहीं आती? यह बात उनके दिल में उतर गई। उन्हें एहसास हुआ कि लोग उन्हें सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि ‘भारत कुमार’ के रूप में देखते हैं। उसी दिन उन्होंने सिगरेट हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला कर लिया।

सम्मान और विरासत

मनोज कुमार ने अभिनेता के साथ-साथ लेखक और निर्देशक के रूप में भी शानदार पहचान बनाई। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ और ‘क्रांति’ जैसी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा के महान फिल्मकारों की सूची में शामिल कर दिया। उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई फिल्मफेयर पुरस्कार और वर्ष 2015 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 4 अप्रैल 2025 को 87 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

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