ऋषिकेश मुखर्जी  (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
मनोरंजन

42 फिल्मों का निर्देशन, दादासाहेब फाल्के से पद्म विभूषण तक सम्मान, फिर भी बेहद सादगी से जीते थे ऋषिकेश मुखर्जी

Hrishikesh Mukherjee Career: ऋषिकेश मुखर्जी ने आम इंसान की जिंदगी और रिश्तों को बेहद सहजता से पर्दे पर उतारा। ऋषि दा को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

सोनाली झा

Hrishikesh Mukherjee Death Anniversary: हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं माना, बल्कि उनमें आम जिंदगी की खूबसूरती और रिश्तों की सच्चाई को भी जगह दी। साल 27 अगस्त 2006 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी फिल्में आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उनमें आम इंसान की जिंदगी नजर आती थी।

मध्यमवर्गीय परिवार, रिश्तों की उलझन, दोस्ती, प्यार, छोटी-छोटी खुशियां और जिंदगी के संघर्ष को ऋषिकेश मुखर्जी ने बेहद सहज अंदाज में पर्दे पर पेश किया। उनकी फिल्मों में बड़े-बड़े सेट या दिखावटी कहानी के बजाय किरदारों और भावनाओं को अहमियत दी जाती थी। यही वजह है कि दर्शकों को उनकी फिल्मों के किरदार अपने आसपास के लोगों जैसे लगते थे। ‘आनंद’ की भावुकता हो या ‘गोलमाल’ की कॉमेडी, ऋषि दा ने हर जॉनर को अपनी अलग शैली दी।

केमिस्ट्री पढ़कर फिल्मों में बनाया करियर

30 सितंबर 1922 को कोलकाता में जन्मे ऋषिकेश मुखर्जी ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री की पढ़ाई की थी। कुछ समय तक उन्होंने शिक्षक के रूप में भी काम किया, लेकिन उनका झुकाव सिनेमा की ओर था। उन्होंने फिल्म एडिटर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की। न्यू थिएटर्स में काम करने के बाद उन्हें मशहूर निर्देशक बिमल रॉय के साथ काम करने का अवसर मिला। साल 1957 में फिल्म ‘मुसाफिर’ से उन्होंने बतौर निर्देशक डेब्यू किया। हालांकि, फिल्म को खास सफलता नहीं मिली।

शतरंज से भी था खास लगाव

ऋषिकेश को साल 1959 में आई ‘अनाड़ी’ ने पहचान दिलाई। उन्होंने बावर्ची, गुड्डी, अभिमान, चुपके-चुपके और गोलमाल जैसी यादगार फिल्में दीं। ऋषिकेश को शतरंज खेलने का भी काफी शौक था। कहा जाता है कि शूटिंग के दौरान वह कई बार सेट पर शतरंज खेलते नजर आते थे। हालांकि, खेल के दौरान भी उनकी नजर शूटिंग पर बनी रहती थी। उनकी कार्यशैली में भी शतरंज की तरह योजना और हर चाल को पहले से समझने की झलक दिखाई देती थी।

चार दशक से ज्यादा का शानदार सफर

ऋषिकेश मुखर्जी ने चार दशकों से ज्यादा लंबे करियर में 42 फिल्मों का निर्देशन किया। सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। 27 अगस्त 2006 को ऋषि दा का निधन हो गया, लेकिन उनका सिनेमा आज भी उतना ही प्रासंगिक है। ‘आनंद’ की संवेदना, ‘गोलमाल’ की शरारत और ‘चुपके-चुपके’ की हंसी के जरिए वह हमेशा दर्शकों के बीच जिंदा रहेंगे।

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