गौरव देवासी फिल्म (फोटो-सोर्स,सोशल मीडिया) 
मनोरंजन

राजस्थान में बन रही है 'पद्मावत' जैसी फिल्म, एक बार फिर बड़े पर्दे पर दिखेगी नई कहानी

Rajasthan Cinema: राजस्थान में फिल्म पद्मावत को लेकर करणी सेना ने खूब विरोध किया था। जिसे आज भी लोगों को याद किया है, लेकिन अब उसी कहानी पर एक और फिल्म बनने जा रही है, जो इतिहास को फिर से जीवंत करेगी।

स्नेहा मौर्या

Historical Drama: राजस्थान की धरती हमेशा से अपने शौर्य, परंपरा और बलिदान के लिए जानी जाती है। इसी गौरवशाली इतिहास को एक बार फिर पर्दे पर जीवंत करने आ रही है फिल्म गोरा बादल। खास बात यह है कि इस फिल्म को करणी सेना का पूरा समर्थन मिल रहा है, जो पहले संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत का विरोध कर चुकी थी। इस बार दर्शकों के साथ-साथ समाज भी इस फिल्म से काफी उम्मीदें लगाए बैठा है।

पाली जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर बॉलीवुड और राजस्थानी सिनेमा में अपनी पहचान बनाने वाले अभिनेता गौरव देवासी इस फिल्म में अहम भूमिका निभा रहे हैं। गौरव फिल्म में दोहरी भूमिका निभा रहे हैं। एक ओर वे ‘अलदीन’ का किरदार निभा रहे हैं, जो अलाउद्दीन खिलजी का साला है और निगेटिव छवि वाला पात्र है। दूसरी ओर वे गोरा का रोल कर रहे हैं, जिनकी वीरता और बलिदान राजस्थान के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा है।

पद्मावत जैसी बन रही है फिल्म

फिल्म की कहानी में दिखाया गया है कि कैसे गोरा और बादल ने रानी पद्मावती और राजा रावल रतन सिंह की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। एक दृश्य में अलाउद्दीन शिकार के दौरान घायल होता है और बाद में रावल रतन सिंह को बंदी बना लेता है। इसके बाद गोरा और बादल चालाकी से अपनी योजना बनाते हैं और पालकियों में वेश बदलकर पहुंचते हैं। खिलजी की सेना से टकराकर वे राजा को सुरक्षित पहुंचाने में सफल होते हैं, लेकिन युद्ध में वीरगति को प्राप्त करते हैं। यह त्याग उन्हें अमर बना देता है।

गौरव देवासी का कहना है कि ऐतिहासिक किरदारों के साथ न्याय करना बेहद जरूरी है। उन्होंने इस रोल के लिए खास तैयारी की है कि चाहे कॉस्ट्यूम हो, बॉडी लैंग्वेज या फेशियल एक्सप्रेशन। फिल्म में खास ध्यान चार मुख्य पात्रों जैसे अलाउद्दीन खिलजी, अलदीन, गोरा और बादल पर दिया गया है।

रीजनल सिनेमा को बॉलीवुड की तुलना में करना पड़ता है चुनौतियों का सामना

गौरव मानते हैं कि रीजनल सिनेमा को बॉलीवुड की तुलना में ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। राजस्थानी भाषा को अब तक संवैधानिक मान्यता न मिलने से फंडिंग और डिस्ट्रीब्यूशन में मुश्किलें आती हैं। अलग-अलग बोलियों जैसे हाड़ौती, मारवाड़ी और शेखावटी की वजह से दर्शकों की पसंद भी बंट जाती है। यही कारण है कि फिल्म को हिंदी और राजस्थानी के मिश्रण में बनाया गया है ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचे।

आपको बता दें, फिल्म की शूटिंग चित्तौड़गढ़ किले के अंदर, बस्सी फोर्ट और डीफोर्ट में की गई है। गौरव बताते हैं कि यह एक ऐतिहासिक अनुभव था क्योंकि दर्शकों को असली विरासत और राजसी ठाठ-बाट का अनुभव मिलेगा। स्थानीय लोगों और राजा साहब ने भी फिल्म को पूरा सहयोग दिया।

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