Highlights:
राजीव गांधी की दोस्ती की खातिर नेता बने थे अमिताभ बच्चन
बोफोर्स घोटाले से साल 2012 में उन्हें पूरी तरह से मिली क्लीन चिट
राजनीति में मिली बड़ी सफलता, फिर अचानक दे दिया इस्तीफा
Amitabh Bachchan Political Career: सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का नाम आते ही बड़े पर्दे की चमक आंखों के सामने आ जाती है, लेकिन उनके जीवन का एक ऐसा अध्याय भी है जो राजनीति के गलियारों से होकर गुजरता है।
फिल्मों में एंग्री यंग मैन बनकर अन्याय के खिलाफ विरोध करने वाले बिग बी ने जब असल जिंदगी में सियासत के मैदान में कदम रखा, तो हर कोई हैरान रह गया। एक भावनात्मक फैसले के चलते शुरू हुआ उनका यह राजनीतिक सफर आखिरकार कड़वे अनुभवों के साथ हमेशा के लिए थम गया।
साल 1984 का वह दौर भारतीय राजनीति के लिए उथल-पुथल भरा था, जब देश ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को खो दिया था। ऐसे मुश्किल समय में अपने बचपन के पक्के दोस्त राजीव गांधी को इमोश्नल सपोर्ट देने के लिए अमिताभ बच्चन ने एक्टिंग की दुनिया से निकलकर राजनीति का दामन थामा।
उन्होंने अपने होमटाउन इलाहाबाद से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने का बड़ा फैसला किया। इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले में उन्होंने दिग्गज राजनेता हेमवती नंदन बहुगुणा को करारी मात दी और चुनावी दंगल के इतिहास में अपनी एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
राजनीति की ऊंचाइयों पर पहुंचे अमिताभ बच्चन के लिए राजनीतिक सफर ज्यादा लंबा नहीं टिक सका। साल 1987 आते-आते देश की राजनीति में बोफोर्स घोटाला सुर्खियों में छा गया, जिसमें अचानक अमिताभ और उनके भाई अजिताभ बच्चन का नाम घसीटा गया।
हालांकि बाद में जांच के दौरान उन पर लगे सारे आरोप बेबुनियाद साबित हुए और साल 2012 में उन्हें पूरी तरह से क्लीन चिट भी मिल गई। लेकिन उस दौर में लगातार हो रहे मीडिया ट्रायल और राजनीतिक विरोध से आहत होकर उन्होंने बिना अपना कार्यकाल पूरा किए बिना संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफा देने के बाद अमिताभ बच्चन ने एक्टिव राजनीति से हमेशा के लिए दूरी बना ली और दोबारा कभी किसी चुनावी रण में नहीं उतरे। बाद के सालों में उनके परिवार और राजनीति के समीकरण भी बदलते रहे, जहां उनकी पत्नी जया बच्चन समाजवादी पार्टी के साथ जुड़कर संसद में एक्टिव हुईं।
एक इंटरव्यू के दौरान खुद अमिताभ बच्चन ने स्वीकार किया था कि राजनीति में आने का उनका फैसला पूरी तरह से भावनात्मक था। उन्होंने माना कि वे सिर्फ एक दोस्त की खातिर वहां गए थे, लेकिन राजनीति की दुनिया में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती।