राजीव लोचन मंदिर सोर्स - सोशल मीडिया
गरियाबंद

राजिम का राजीव लोचन मंदिर: गजेंद्र मोक्ष प्रसंग, विष्णु अवतार और आस्था की पूरी कहानी

Rajiv Lochan Temple Rajim : छत्तीसगढ़ के राजिम स्थित राजीव लोचन मंदिर में गजेंद्र मोक्ष, राजिम तेलीन की भक्ति और भगवान के तीन रूपों में दर्शन की अनूठी परंपरा है।

ऐश्वर्या द्विवेदी

Highlights

  • राजिम का राजीव लोचन मंदिर छत्तीसगढ़ की आस्था का बड़ा केंद्र है।

  • यह मंदिर महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के पवित्र संगम पर स्थित है।

  • गर्भगृह के द्वार पर उकेरी प्रतिमाएं गजेंद्र मोक्ष प्रसंग से जुड़ी हैं।

  • भक्त यहां भगवान विष्णु के तीन अलग स्वरूपों के दर्शन करते हैं।

  • परिसर में राजिम तेलीन का देवालय और विष्णु अवतारों के मंदिर हैं।

Rajim Chhattisgarh Tourist Places : राजीव लोचन मंदिर के मंडप में भगवान विष्णु गरुड़ पर विराजमान हैं। उनके चरणों में सालिग्राम शिला स्थापित है। साथ ही माता लक्ष्मी, माया और बालाजी की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। गर्भगृह के मुख्य द्वार पर हाथी और मगरमच्छ उकेरे गए हैं।

हाथी को गजेंद्र और मगरमच्छ को ग्राह का प्रतीक माना जाता है। यह शिल्प भगवान विष्णु के गजेंद्र मोक्ष प्रसंग को दर्शाता है। पौराणिक कथा के अनुसार ग्राह ने स्नान करते गजेंद्र का पैर पकड़ लिया था। कठिन संघर्ष के बाद गजेंद्र ने भगवान विष्णु का ध्यान किया। तब श्रीहरि ने प्रकट होकर ग्राह का वध किया और मुक्ति दिलाई।

नाम का अर्थ और राजिम तेलीन

राजीव शब्द का अर्थ कमल होता है। लोचन का अर्थ नेत्र होता है। कमल जैसे सुंदर नेत्रों वाले भगवान को राजीव लोचन कहते हैं। यह नाम भगवान के दिव्य स्वरूप की व्याख्या करता है। मंदिर परिसर में राजिम तेलीन का देवालय भी बना हुआ है।

स्थानीय मान्यता है कि वह भगवान की अनन्य भक्त थीं। उनकी भक्ति से जुड़ी कथाएं क्षेत्र में आज भी प्रसिद्ध हैं। प्राचीन समय में यह क्षेत्र पद्मावती पुरी कहलाता था। बाद में भक्त राजिम तेलीन के नाम पर इसका नाम राजिम पड़ा। श्रद्धालु इस देवालय का दर्शन श्रद्धापूर्वक करते हैं।

चार अवतारों के देवालय

मुख्य मंदिर के चारों ओर भगवान विष्णु के चार अवतार विराजमान हैं। इनमें नृसिंह, वामन, वराह और बद्रीनारायण के देवालय शामिल हैं। उत्तर द्वार से निकलने पर साक्षी गोपाल के दर्शन होते हैं। एक ही परिसर में विष्णु के कई रूपों के दर्शन मिलते हैं।

मंदिर की बनावट में पत्थर और ईंट का प्रयोग हुआ है। चूने की पुताई से इसका बाहरी हिस्सा सफेद दिखता है। दिवारों और स्तंभों पर उकेरी आकृतियां प्राचीन शिल्प कला को दर्शाती हैं। यह स्थापत्य तत्कालीन शिल्पकारों की निपुणता का बेहतरीन प्रमाण है।

दिन में तीन रूपों में दर्शन

मंदिर में पूजा की बेहद अनोखी परंपरा प्रचलित है। सुबह भगवान बाल स्वरूप में नजर आते हैं। दोपहर में युवा और रात में वृद्ध रूप में दर्शन देते हैं। दोपहर 12 बजे भोग के बाद मंदिर के पट बंद होते हैं।

मान्यता है कि इस समय भगवान विश्राम करते हैं। दोपहर 2:30 बजे पट पुनः खोल दिए जाते हैं। शनिवार को भगवान का विशेष पूजन और श्रृंगार होता है। इस दिन तिल के तेल से लेप करने का विधान है। भक्त इसे भगवान की लीला मानकर नमन करते हैं।

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