Chhattisgarh Court Cancels Department Order : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रशासनिक नियमों पर बड़ी बात कही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक न्याय का पालन बेहद जरूरी है। किसी भी संस्था पर कार्रवाई से पहले उसका पक्ष सुनना अनिवार्य है।
यह मामला पुलिस विभाग और एक निजी कंपनी से जुड़ा हुआ है। विभाग ने टावर निर्माण में कमी का हवाला देकर कार्रवाई की थी। लेकिन कोर्ट ने इस प्रक्रिया को गलत माना है।
दिल्ली की कंपनी को 33 संचार टावर लगाने का ठेका मिला था। कंपनी के प्रोपराइटर शिव कुमार शर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनका दावा था कि काम समय पर पूरा हो गया था।
हालांकि विभाग ने सिर्फ 13 टावरों का भुगतान किया। शेष 20 टावरों के भुगतान पर रोक लगा दी गई। विभाग ने निर्माण में निविद की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाया।
कंपनी का कहना है कि बकाया राशि पर मध्यस्थता लंबित है। फरवरी 2026 में कंपनी को कमियां दूर करने का पत्र मिला था। मार्च तक काम पूरा न होने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
इसके बाद 16 जून 2026 को कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। कंपनी ने कोर्ट में कहा कि उन्हें उचित नोटिस नहीं मिला। पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही यह कार्रवाई की गई।
राज्य सरकार ने अदालत में अपना रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि कंपनी को पर्याप्त समय दिया गया था। विभाग ने अगस्त 2025 के एक पत्र का हवाला भी दिया।
सरकार के मुताबिक कंपनी ने तकनीकी खामियों को स्वीकार किया था। इसके बावजूद कोर्ट ने माना कि प्रक्रिया सही नहीं थी। ब्लैकलिस्ट करने से पहले विधिवत सुनवाई होना आवश्यक था।
अदालत के फैसले से कंपनी को बड़ी राहत मिली है। अब कंपनी 30 दिनों के भीतर अपना जवाब पेश करेगी। इसके बाद विभाग प्रस्तुत जवाब पर विचार करेगा। नियमों के तहत ही विभाग आगे कदम उठा सकता है। इस फैसले से प्रशासनिक अधिकारियों को कड़ा संदेश मिला है। किसी भी कार्रवाई में नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा।