रायपुर के घरौंदा सेंटरों में बच्चों की मौत मामला।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपनाया कड़ा रुख।
11 कोर्ट कमिश्नरों की नियुक्ति का आदेश।
कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को गंभीर और अमानवीय बताया।
Bilaspur High Court Decision: रायपुर के घरौंदा सेंटरों में बच्चों की मौत और पांच बच्चों के लापता होने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को गंभीर और अमानवीय बताते हुए सभी कोर्ट कमिश्नरों को जल्द से जल्द निरीक्षण रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बच्चों की देखभाल के लिए सरकार ने तीन साल में करीब 9 करोड़ रुपये खर्च किए, तो फिर उनकी सुरक्षा और देखरेख में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई?
मामले की सुनवाई के दौरान वित्त विभाग और समाज कल्याण विभाग के सचिवों के साथ मुख्य सचिव की ओर से शपथपत्र पेश किया गया था। इसमें शासन ने घरौंदा सेंटरों पर पिछले तीन वर्षों में करीब 9 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की जानकारी दी थी। इसके बावजूद बच्चों की मौत और उनके लापता होने की घटनाओं ने सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाईकोर्ट ने मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए 11 कोर्ट कमिश्नरों की नियुक्ति की है। इनमें एडवोकेट विवेक श्रीवास्तव, अपूर्व त्रिपाठी, संघर्ष पाण्डेय, सूर्या कंवलकर डांगी, शिवाली दुबे, अदिति सिंघवी और ईश्वर जायसवाल सहित अन्य अधिवक्ता शामिल हैं। सभी कोर्ट कमिश्नरों को केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के तहत संचालित घरौंदा सेंटरों का निरीक्षण कर वहां रहने वाले बच्चों की स्थिति, भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए गए हैं।
दरअसल, रायपुर की संस्था कोपलवाणी ने इस पूरे मामले को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया कि बच्चों की देखभाल के लिए संचालित संस्थानों में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है। यहां तक कि बच्चों की मौत भूखमरी के कारण होने की बात भी सामने आई है। शिकायत के बाद शासन ने घरौंदा योजना के तहत पीतांबरा सहित चार संस्थाओं को करीब 9 करोड़ 76 लाख रुपये का अनुदान दिया था।
याचिका में बताया गया है कि पीतांबरा और अन्य संस्थाओं में वर्ष 2014 से अब तक अलग-अलग घटनाओं में आठ बच्चों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा पांच बच्चों के लापता होने का मामला भी सामने आया है। इन घटनाओं ने संस्थानों में बच्चों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
घरौंदा योजना का उद्देश्य निराश्रित बच्चों और वयस्कों को सुरक्षित आश्रय और देखभाल उपलब्ध कराना है। इस योजना के तहत सेरेब्रल पाल्सी, एडीएचडी और ऑटिज्म जैसी स्थितियों से प्रभावित जरूरतमंद लोगों के लिए आवासीय केंद्र संचालित किए जाते हैं। यहां नाबालिग बच्चों के साथ 18 वर्ष से अधिक उम्र के निराश्रित लोगों को भी रखा जाता है।
अब हाईकोर्ट की निगरानी में इन केंद्रों की वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद है। कोर्ट कमिश्नरों की रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकेगा कि सरकारी अनुदान के बावजूद बच्चों को जरूरी सुविधाएं क्यों नहीं मिल पाईं और मौतों व लापता होने की घटनाओं के पीछे क्या वजहें रहीं।