राष्ट्रपति के बस्तर प्रवास के दौरान काछन देवी की परंपरा को लेकर विवाद।
बस्तर दशहरा की 618 साल पुरानी परंपरा पर बवाल।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचा विवाद का मामला।
पीहू दास की जगह दूसरी कन्या को राष्ट्रपति से मिलवाने पर पनका समाज नाराज।
Chhattisgarh Bastar Dussehra Controversy: बस्तर दशहरा की 618 साल पुरानी परंपरा में आखिर ऐसा क्या हुआ कि मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंच गया? राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बस्तर प्रवास के दौरान काछन देवी की परंपरा को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। पनका समाज का आरोप है कि राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान परंपरागत रूप से काछन देवी की भूमिका निभाने वाली कन्या पीहू दास की जगह दूसरी कन्या को प्रस्तुत किया गया। समाज ने इसे अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा की अनदेखी बताते हुए निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है।
संयुक्त संघर्ष मोर्चा पनका/पनिका समाज छत्तीसगढ़ ने 2 नवंबर को कलेक्टर के माध्यम से प्रधानमंत्री को पांच सूत्रीय ज्ञापन भेजा है। इसमें 23 अक्टूबर को राष्ट्रपति की मौजूदगी में लालबाग में आयोजित कार्यक्रम के दौरान हुई कथित अनियमितता को प्रमुखता से उठाया गया है।
बस्तर दशहरा की काछनगादी रस्म में पनका समाज की कन्या कांटों के झूले पर बैठकर काछन देवी का प्रतीकात्मक स्वरूप धारण करती है। मान्यता है कि देवी की अनुमति मिलने के बाद ही दशहरा उत्सव की शुरुआत होती है। समाज का दावा है कि पिछले वर्षों से पीहू दास यह परंपरा निभाती आ रही हैं, लेकिन राष्ट्रपति के सामने उन्हें प्रस्तुत करने के बजाय दूसरी कन्या को मिलवाया गया। समाज ने सवाल उठाया है कि आखिर यह बदलाव किसके निर्देश पर हुआ और परंपरा निभाने वाली कन्या को क्यों अलग रखा गया?
समाज ने 8 दिसंबर 1971 की अधिसूचना का हवाला देते हुए छत्तीसगढ़ में पनका/पनिका समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में पुनः शामिल करने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने की मांग की है।
बस्तर दशहरा के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले पनका समाज के हजारों श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए जगदलपुर में विशाल सर्वसुविधायुक्त सामुदायिक भवन बनाने की मांग भी की गई है। इसके साथ ही श्रद्धालुओं के भोजन, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए हर साल सरकारी बजट निर्धारित करने की मांग रखी गई है।
समाज चाहता है कि काछन देवी के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तथा बस्तर दशहरा में उनकी भूमिका को स्कूली, महाविद्यालयीन और विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। साथ ही बस्तर दशहरा की पारंपरिक रस्मों में पनका समाज की सहभागिता और अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
पांच सूत्रीय ज्ञापन के जरिए समाज ने केंद्र और राज्य सरकार से सभी मांगों पर समयबद्ध कार्रवाई का आग्रह किया है। राष्ट्रपति के सामने हुई प्रतीकात्मक प्रस्तुति को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब बस्तर की सांस्कृतिक परंपरा, सामाजिक सम्मान और अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बन गया है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले पर क्या स्पष्टीकरण देता है और समाज की मांगों पर क्या कदम उठाए जाते हैं।