बस्तर दशहरा का समापन सोर्स - नवभारत लाइव
बस्तर

75 दिवसीय बस्तर दशहरा संपन्न, कुटुंब जात्रा के बाद दंतेवाड़ा लौटी मां दंतेश्वरी की डोली

Bastar Dussehra Ending Date : 75 दिनों तक चलने वाला ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के राजछत्र की भावपूर्ण विदाई के साथ संपन्न हुआ।

अजय श्रीवास्तव, ऐश्वर्या द्विवेदी

Chhattisgarh Famous Bastar Dussehra End : 75 दिनों तक बस्तर की धरती को आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति के रंग में रंगने वाला ऐतिहासिक बस्तर दशहरा अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है। मंगलवार को मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र को भावपूर्ण विदाई दी जा रही है।

इसके साथ ही वह महापर्व अगले वर्ष तक के लिए विराम लेगा, जिसमें देवी-देवताओं के मिलन से लेकर विजय रथ की परिक्रमा और मुरिया दरबार तक बस्तर की विशिष्ट परंपराओं की झलक देखने को मिली।

दंतेवाड़ा से आईं, बस्तर की परंपराओं में रहीं सहभागी

बस्तर दशहरा की परंपरा के अनुसार, मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी का छत्र दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाया जाता है। शारदीय नवरात्र के दौरान इनके आगमन के साथ ही मावली परघाव का विधान संपन्न होता है।

बस्तर राजपरिवार और श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ माता की अगवानी करते हैं। इसके बाद डोली और छत्र को मां दंतेश्वरी मंदिर में विराजमान किया जाता है, जहां दशहरा के प्रमुख धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालु दर्शन करते हैं।

अब पर्व के सभी प्रमुख विधान पूरे होने के बाद माता की डोली और छत्र को ससम्मान दंतेवाड़ा रवाना किया जा रहा है। आगमन के समय जिस तरह श्रद्धालुओं ने जयकारों और पारंपरिक स्वागत के साथ माता का अभिनंदन किया था, उसी तरह विदाई के अवसर पर भी श्रद्धा और आत्मीयता का भाव जुड़ा हुआ है।

1700 से अधिक देवी-देवताओं का जुटा था कुटुंब

बस्तर दशहरा का अंतिम चरण भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। कुटुंब जात्रा में बस्तर संभाग के 84 परगनों और सीमावर्ती क्षेत्रों से पहुंचे 1700 से अधिक देवी-देवताओं के प्रतीकों को पारंपरिक पूजा-अर्चना और सम्मान के साथ विदाई दी गई। गांव-गांव से पहुंचे आंगा देव, छत्र और डोलियों की सहभागिता ने इस आयोजन को व्यापक सांस्कृतिक मिलन का स्वरूप दिया।

बस्तर की परंपरा में देवी-देवताओं को केवल पूजा के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि गांवों और समुदायों के साझा कुटुंब का हिस्सा माना जाता है। इसी भावना के साथ दशहरा में आमंत्रित देवी-देवताओं का स्वागत किया जाता है और आयोजन पूरा होने पर उन्हें सम्मानपूर्वक उनके मूल स्थानों के लिए विदा किया जाता है।

एक साल का इंतजार, फिर जुटेगा आस्था का कारवां

12 अगस्त को पाट जात्रा के साथ शुरू हुआ बस्तर दशहरा रथ परिक्रमा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी, मुरिया दरबार और कुटुंब जात्रा जैसे प्रमुख पड़ावों से गुजर चुका है। अब मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की विदाई के साथ इस वर्ष के आयोजन का धार्मिक समापन होगा।

बस्तर दशहरा की खासियत यही है कि यहां उत्सव का अंत केवल एक आयोजन की समाप्ति नहीं, बल्कि देवी-देवताओं, ग्रामीण समुदायों और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के बीच संबंधों को फिर से जीवंत करने का अवसर भी है। माता की डोली और छत्र के दंतेवाड़ा लौटने के साथ जगदलपुर में 75 दिनों से गूंज रहे जयकारे थम जाएंगे, लेकिन बस्तर की लोक आस्था में अगले दशहरा की प्रतीक्षा शुरू हो जाएगी।

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