

बस्तर दशहरा की आखिरी रस्म निभाई गई।
जगदलपुर के गांधी स्कूल में संपन्न हुई कुटुंब जात्रा।
बस्तर दशहरा में राजपरिवार की अहम भूमिका।
महाराजा कमलचंद्र भंजदेव की उपस्थिति में संपन्न हुई अंतिम रस्म।
Bastar Dussehra in Traditions: बस्तर दशहरा में देवी-देवताओं का स्वागत ही नहीं, उनकी विदाई भी खास होती है। 75 दिनों तक चलने वाले इस अनूठे महापर्व में गांव-गांव से आए देवी-देवता केवल धार्मिक अनुष्ठानों के सहभागी नहीं, बल्कि बस्तर के विशाल सांस्कृतिक परिवार का हिस्सा बनते हैं। पर्व के अंतिम चरण में होने वाली कुटुंब जात्रा इसी आत्मीय रिश्ते को निभाने का विधान है, जहां पूजा-अर्चना, पारंपरिक भेंट और सम्मान के साथ देवी-देवताओं को उनके गांवों के लिए विदा किया जाता है।
शनिवार को नगर के गांधी स्कूल में बस्तर दशहरा की कुटुंब जात्रा का विधान बस्तर महाराजा कमलचंद्र भंजदेव की उपस्थिति में संपन्न हुआ। राजपरिवार की मौजूदगी इस आयोजन की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ाव को रेखांकित करती है। बस्तर दशहरा में राजपरिवार की भूमिका लंबे समय से पर्व की परंपराओं और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रही है।
बस्तर दशहरा की सबसे खास बात यह है कि इसका स्वरूप सिर्फ जगदलपुर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की आराधना तक सीमित नहीं है। बस्तर के विभिन्न गांवों से देवी-देवताओं के छत्र और डोलियां अपने पुजारियों तथा पारंपरिक सेवकों के साथ यहां पहुंचते हैं। उनकी सहभागिता इस महापर्व को पूरे अंचल की आस्था और परंपराओं का साझा मंच बनाती है।
कुटुंब जात्रा में इन्हीं देवी-देवताओं को कुटुंब का सदस्य मानकर पूजा-अर्चना की जाती है। यह विधान बताता है कि बस्तर की परंपरा में देवी-देवताओं के बीच संबंध केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि गांवों और समुदायों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक रिश्तों का भी प्रतीक हैं।
कुटुंब जात्रा में आमंत्रित देवी-देवताओं के प्रतिनिधियों और पुजारियों को पारंपरिक रूसूम यानी भेंट देकर सम्मानित किया जाता है। इसमें परंपरा के अनुसार वस्त्र, धनराशि और मिठाइयां शामिल हो सकती हैं। पूजा-अर्चना और सम्मान की रस्म पूरी होने के बाद छत्र और डोलियों को उनके गांवों के लिए विदा किया जाता है। इस विधान में बस्तर की उस परंपरा की झलक मिलती है, जिसमें अतिथि का स्वागत करना ही नहीं, बल्कि विदाई के समय भी सम्मान और आत्मीयता बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।
कुटुंब जात्रा में क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना भी जुड़ी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुरूप धार्मिक विधान पूरे किए जाते हैं और देवी-देवताओं की विदाई के साथ बस्तर दशहरा अपने समापन की ओर बढ़ता है। कुटुंब जात्रा का महत्व इसी भाव में छिपा है-75 दिनों तक चलने वाले महापर्व में गांवों से आए देवी-देवता बस्तर के सांस्कृतिक परिवार का हिस्सा बनते हैं और विदाई के समय भी उन्हें उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ लौटाया जाता है। यही परंपरा बस्तर दशहरा को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, रिश्तों और सामुदायिक एकता का अनूठा पर्व बनाती है।