Prashant Kishor Wins Bankipur Bypoll: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट में हाल ही में हुए उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) ने 19,324 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। बांकीपुर की सीट को सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का गढ़ माना जाता था। करीब एक दशक से भी अधिक समय तक यह बीजेपी का दबदबा रहा था, लेकिन उपचुनाव में पीके की जीत के साथ यह किला ढह गया।
उपचुनाव को आमतौर पर सत्ताधारी पार्टी के लिए आसान माना जाता है, क्योंकि सारी मशिनरी उनके ही इशारे पर चलती है। इसलिए बीजेपी को भी लगा था कि वो यह चुनाव आसानी से जीत लेगें, लेकिन वो लाख कोशिशों के बाद भी इसे नहीं जीत पाए। हालांकि इससे एनडीए को ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन असली संकट का सामना मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को करना पड़ सकता है। आइए आपको बताते हैं कि बीजेपी अपना मजबूत किला क्यों नहीं बचा पाई? और पीके विधानसभा पहुंचने से सम्राट चौधरी के साथ तेजस्वी यादव को क्यों और कैसे समस्या हो सकती है?
बांकीपुर को बिहार में बीजेपी का सबसे मजबूत किला माना जाता रहा है। 1995 से 2025 तक इस सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा था। भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन खुद 2010 से यहां चुनाव लड़कर तीन बार विधायक बने थे। वो नितिन नबीन ही थे जिनके राज्यसभा जाने के चलते यह सीट खाली हुई थी। बांकीपुर को एक तरह से बीजेपी का किला कहा जाता था। बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक बार बयान दिया था कि अगर बांकीपुर से भाजपा के नाम पर चप्पल को भी चुनाव में खड़ा किया जाए तो वो भी जीत जाएगा।
बांकीपुर उपचुनाव जीत हासिल करके प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में औपचारिक रूप से एंट्री कर ली है। इसके साथ ही उन्होंने सत्ताधारी भाजपा समेत अन्य पार्टियों को भी यह संदेश दे दिया है कि देर से ही सही बिहार की जनता को उनपर भरोसा करने लगी लगी। इसके अलावा पीके ने बांकीपुर सीट से चुनाव में उतरकर जनता को यह संदेश दे दिया है वो बिहार के साथ मजबूती से खड़े हैं। प्रशांत किशोर ने जब जन सुराज पार्टी बनाकर 2025 के विधानसभा चुनाव में बिहार के 243 में से 238 में उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया, तब लोगों को लगा था कि पीके खुद भी चुनावी मैदान में उतरेंगे।
पीके ने सभी को हैरान करते हुए खुद किसी भी सीट से चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया। उनके इस फैसले ने जनता के मन में दुविधा को जन्म देने का काम किया। प्रशांत किशोर भारतीय राजनीति में एक दशक से भी अधिक समय से सक्रिय है, लेकिन इस दैरान उनकी भूमिका राजनीतिक सलाहकार की थी न कि राजनेता की। ऐसे में जनता को लगने लगा कि वो जन सुराज में भी सलाहकार और मार्गदर्शक की भूमिका में ही नजर आएंगे। इसका असर चुनावी नतीजों में भी साफ दिखाई दिया और उनकी जन सुराज भी सीट नहीं जीत पाई। लेकिन इस बार वो जनता को संदेश देने में कामयाब रहे कि वो लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।
प्रशांत किशोर की जीत से बिहार में बीजेपी की सत्ता को अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। बिहार में एनडीए के पास 202 सीटों हैं, जो बहुतमत के 122 के आंकड़े से काफी ज्यादा है। लेकिन बांकीपुर में मिली हार बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को काफी भारी पड़ सकती है। क्योंकि मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला चुनाव था जो बीजेपी बिहार में लड़ रही थी। बांकीपुर को बीजेपी की सबसे सुरक्षित सीट माना जाता है इसके बाद भी बीजेपी ने यह चुनाव प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी। खुद नितिन नबीन और सम्राट चौधरी यहां बीजेपी उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार करने पहुंचे। लेकिन इसके बाद भी पार्टी बुरी तरह से चुनाव हार गई। इसके पीछे हालिया छात्र प्रदर्शन और बीजेपी की अंदरूनी टसल को माना जा रहा है।
इसके अलावा प्रशांत किशोर लगातार सम्राट चौधरी की पढ़ाई और डिग्री को लेकर हमलावर रहे हैं। उन्होंने चुनाव जीतने के बाद मीडिया से बात करते हुए पहला हमला सम्राट चौधरी पर ही किया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को बिहार में किसी पढ़े लिखे नेता को कमान सौंपनी चाहिए। ऐसे में माना जा रहा है कि पीके विधानसभा में भी चौधरी को लेकर और हमलावर हो सकते हैं।
सम्राट चौधरी के अलावा प्रशांत किशोर के सक्रिय राजनीति में आने से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को भी नुकसान हो सकता है। उपचुनाव में आरजेडी उम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहे, यह पार्टी के लिए एक गंभीर समस्या माना जा रहा है। इससे पटना के इस महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र में आरजेडी की जमीनी पकड़ को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
बिहार की राजनीति में लंबे समय से यह धारणा रही है कि अधिकांश सीटों पर मुख्य मुकाबला भाजपा और आरजेडी के बीच होता है। हालांकि, बांकीपुर के नतीजों ने इस धारणा को चुनौती दी है। यहां आरजेडी न सिर्फ जीत की दौड़ से दूर रही, बल्कि मुकाबले में भी प्रभावी स्थिति नहीं बना सकी।
बांकीपुर के नतीजे तेजस्वी यादव की एम-वाई (मुस्लिम-यादव) और ए-टू-जेड सामाजिक समीकरण की राजनीति के सामने भी नई चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस दौरान प्रशांत किशोर ने पदयात्रा, जमीनी संपर्क और सीधे संवाद के जरिए युवाओं तथा बदलाव की तलाश कर रहे मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। वहीं, आरजेडी पारंपरिक चुनावी रणनीतियों से आगे निकलकर नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में नए खिलाड़ी हैं, इसलिए उन्हें लेकर फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।