नीतीश कुमार, लालू यादव (Image- Social Media) 
बिहार

जाति है कि जाती नहीं...नीतीश को लव-कुश तो लालू को MY फार्मूले से मिली सत्ता, इस बार भी कास्ट ही बनेगी योग्यता!

Bihar Politics: बिहार में नए मुख्यमंत्री को लेकर सस्पेंस बरकरार है। NDA में जातीय समीकरणों को साधने पर मंथन जारी। सम्राट चौधरी या कोई नया चेहरा? अगले दो दिनों में होगा नाम का औपचारिक ऐलान।

अर्पित शुक्ला

Bihar New CM Scenario: जाति है कि जाती नहीं...इन दिनों बिहार के सियासी समीकरणों को देखकर बच्चा लाल 'उन्मेष' की यही कविता याद आती है। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरणों की भूमिका हमेशा से बेहद अहम रही है। पहले का दौर अलग रहा होगा, लेकिन 1990 के बाद बिहार की राजनीति में जातीय-सामाजिक समीकरणों का स्पष्ट उदय देखा गया। आज स्थिति यह है कि राज्य में सक्रिय सभी क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ राष्ट्रीय पार्टियों को भी इस सच्चाई के साथ चलना पड़ता है। इसे स्थापित करने का श्रेय अक्सर लालू प्रसाद यादव को दिया जाता है, जबकि नीतीश कुमार को इसका व्यवस्थित उपयोग करने वाला नेता माना जाता है। दोनों की कार्यशैली में हालांकि बड़ा अंतर रहा है।

लालू यादव और उनके बाद उनके पुत्र तेजस्वी यादव को आज भी यह भरोसा है कि जातीय समीकरणों के सहारे वे एक दिन फिर से बिहार की सत्ता हासिल कर सकते हैं। लालू को इस सामाजिक-राजनीतिक समीकरण के लिए जमीन उस समय के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के बाद मिली।

मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण था लालू का सियासी केंद्र

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इसी पृष्ठभूमि में ‘भूराबाल साफ करो’ जैसे नारे उभरकर सामने आए, जिनके जरिए उन्होंने अपनी राजनीति को धार दी। इसी रणनीति के बल पर लालू परिवार ने करीब 15 वर्षों तक बिहार की सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पहले लालू मुख्यमंत्री बने, और चारा घोटाले में फंसने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी की कमान बनाए रखने के लिए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया।

उनकी राजनीति का केंद्र लंबे समय तक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण रहा, हालांकि आलोचकों का कहना है कि इससे अन्य पिछड़े वर्गों, अति पिछड़ों और दलितों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। आरोप यह भी लगते हैं कि इस दौर में कुछ खास नेताओं और अपने करीबी लोगों को अधिक राजनीतिक अवसर दिए गए। परिवार के भीतर भी राजनीतिक स्थानांतरण स्पष्ट दिखा संबंधियों को आगे बढ़ाया गया और परिवार की महिला सदस्य को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाया गया।

लालू यादव (Image- Social Media)

मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद देश में सवर्ण और पिछड़े वर्गों के बीच जो राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ, उसका बड़ा लाभ बिहार में लालू यादव और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने उठाया। कहा जाता है कि इस दौर में मुस्लिम-यादव गठजोड़ से जुड़ी राजनीति के कारण अन्य कई वर्गों को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका।

नीतीश का ‘लव-कुश’ समीकरण

इसके विपरीत नीतीश कुमार ने अलग तरीके से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की। उन्होंने कुर्मी और कोइरी (कुशवाहा) जातियों के सहारे ‘लव-कुश’ समीकरण तैयार किया और उसे संगठित किया। शुरुआत में उन्हें सफलता आसानी से नहीं मिली, लेकिन बाद में वे सत्ता तक पहुंचने में सफल रहे। नीतीश की रणनीति यह रही कि उन्होंने केवल एक समीकरण पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न जातियों को साधने की कोशिश की और अलग-अलग वर्गों में अपना समर्थन आधार बनाया।

नीतीश कुमार (Image- Social Media)

उन्होंने दलित समाज के भीतर भी अलग-अलग वर्गीकरण किया और मुसलमान समुदाय में भी उपवर्गों को साधने की कोशिश की। इन रणनीतियों के जरिए उन्होंने अपना जनाधार विस्तृत किया। कहा जाता है कि जेडीयू को मिलने वाले अतिरिक्त वोटों में इस रणनीतिक सामाजिक इंजीनियरिंग की अहम भूमिका रही।

राष्ट्रीय पार्टियां भी नहीं है अछूती

राष्ट्रीय दल भी इस जातीय राजनीति से अछूते नहीं रहे। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ने समय के साथ अपने-अपने तरीके से सामाजिक समीकरणों के अनुसार रणनीति बदली। कांग्रेस पर यह आरोप लगता है कि उसने अब परंपरागत सवर्ण वोट बैंक की तुलना में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है। टिकट वितरण और संगठनात्मक ढांचे में भी यह बदलाव देखा गया है।

नीतीश कुमार बदलते रहे रणनीति

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, वहीं राजद अब भी मुख्य रूप से मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण पर निर्भर है, लेकिन हाल के वर्षों में इस समीकरण की प्रभावशीलता पर सवाल उठे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि दलितों, पिछड़ों और मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से में राजनीतिक विकल्पों के बदलाव के कारण राजद का पारंपरिक वोट बैंक पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। इसके चलते पार्टी का वोट प्रतिशत अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा है।

नीतीश कुमार (Image- Socil Media)

नीतीश कुमार की राजनीति में समय-समय पर नए समीकरणों के प्रयोग भी देखने को मिले हैं। उन्होंने अपने समर्थक जातीय समूहों को संगठित करने के साथ-साथ प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर भी संतुलन बनाने की कोशिश की। उनकी रणनीति को कई लोग एक व्यावहारिक और बहुस्तरीय सामाजिक समीकरण का उदाहरण मानते हैं। हालांकि इन सब के बावजूद भी जाति ही सियासत के केंद्र में रही।

नए सीएम पर सस्पेंस

इस प्रकार, बिहार की राजनीति आज भी जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती है। लालू यादव की राजनीति ने जहां इसे बड़े पैमाने पर स्थापित किया, वहीं नीतीश कुमार ने इसे और अधिक सूक्ष्म और विस्तृत रूप दिया। राष्ट्रीय पार्टियों ने भी धीरे-धीरे इसी ढांचे के भीतर खुद को ढाल लिया है।

बिहार के दोनों डिप्टी सीएम के साथ अमित शाह (Image- Social Media)

अब एक बार फिर NDA को बिहार में नए मुख्यमंत्री का चयन करना है और अस बार भी सत्ता का केंद्र जाति ही रहने वाली है। BJP और JDU दोनों पार्टियां नए मुख्यमंत्री को लेकर मंथन कर रही हैं। अगले दो दिनों में नए मुख्यमंत्री के नाम से सस्पेंस हट जाएगा। फिलहाल सबकी नजर भाजपा पर है कि BJP हर बार की तरह इस बार भी किसी नए चेहरे को मौका देती है या सम्राट चौधरी जैसे दिग्गज को राज्य का CM बनाती है।

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