पारू विधानसभा, (कॉन्सेप्ट फोटो) 
बिहार

पारू विधानसभा: भाजपा का किला टूटा, 2025 में चेहरा बनाम दल की कड़ी टक्कर

Bihar Assembly Elections: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पारू सीट पर चार बार के विधायक अशोक सिंह (निर्दलीय) की एनडीए और राजद से टक्कर है। चेहरा बनाम दल और भूमिहार-यादव समीकरण इस सीट पर में निर्णायक...

अमन उपाध्याय

Paroo Assembly Constituency: मुजफ्फरपुर जिले की पारू विधानसभा सीट उत्तर बिहार की राजनीति में एक प्रमुख सीट मानी जाती है। यह वैशाली लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और सामान्य वर्ग की सीट है।

इस बार यह सीट बिहार चुनाव 2025 में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई है, क्योंकि यहाँ का मुकाबला 'चेहरा बनाम पार्टी' की थीम पर केंद्रित हो गया है। भाजपा से चार बार लगातार विधायक रह चुके अशोक कुमार सिंह ने पार्टी से टिकट न मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में ताल ठोंक दी है।

अशोक कुमार सिंह का वर्चस्व और पार्टी का फैसला

अशोक कुमार सिंह इस क्षेत्र में पिछले दो दशकों से प्रभावी चेहरा रहे हैं।

अजेय रिकॉर्ड: उन्होंने अक्टूबर 2005, 2010, 2015 और 2020 में भाजपा के टिकट पर लगातार चार बार जीत दर्ज की। 2020 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी शंकर प्रसाद को हराया था।

बदले समीकरण: इस बार समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। भाजपा ने अपने चार बार के विधायक अशोक कुमार सिंह को टिकट नहीं दिया है। यह सीट एनडीए के सहयोगी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (उपेंद्र कुशवाहा) के खाते में दे दी गई है, जिसने मदन चौधरी को उम्मीदवार बनाया है।

2025 का त्रिकोणीय चुनावी दंगल

भाजपा द्वारा टिकट काटे जाने के बाद, अशोक कुमार सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में ताल ठोंक दी है, जिससे यहाँ का मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है।

निर्दलीय (अशोक कुमार सिंह): अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता और 20 साल के वर्चस्व को भुनाना चाहेंगे।

एनडीए (राष्ट्रीय लोक मोर्चा): मदन चौधरी पार्टी के संगठनात्मक बल और प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर निर्भर रहेंगे।

राजद (महागठबंधन): राजद ने शंकर प्रसाद पर एक बार फिर भरोसा जताया है। वह अशोक सिंह के बागी होने का फायदा उठाना चाहेंगे।

जन सुराज पार्टी: रंजना कुमारी भी मैदान में हैं।

कुल 10 उम्मीदवार इस बार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन असली लड़ाई इन तीन प्रमुख ध्रुवों के बीच है।

निर्णायक जातीय समीकरण

पारू विधानसभा में जातिगत समीकरण किसी भी चुनाव का फैसला करने में सबसे अहम रहे हैं।

प्रमुख जातियाँ: यहाँ भूमिहार, यादव और राजपूत जाति का दबदबा है। 1969 के बाद से अब तक यही जातियां इस क्षेत्र से विधायक चुनती रही हैं।

राजपूतों का बंटवारा: अशोक कुमार सिंह के निर्दलीय उतरने से राजपूत वोटों का बड़ा हिस्सा उनके साथ जा सकता है, जिससे एनडीए उम्मीदवार के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है।

यादव और भूमिहार: राजद को यादव वोटों को संगठित करना होगा, जबकि भूमिहार वोटों को एनडीए और अशोक सिंह के बीच बंटने की संभावना है। यह जातीय गोलबंदी ही जीत का रास्ता तय करेगी।

अर्थव्यवस्था और विकास

पारू का यह इलाका पूरी तरह ग्रामीण है और इसकी अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है। यहाँ धान, गेहूं, मक्का और दलहन प्रमुख फसलें हैं। बड़े उद्योगों की अनुपस्थिति में यहाँ चावल मिल, ईंट भट्ठे और कृषि व्यापार केंद्र ही रोजगार के प्रमुख स्रोत हैं। पारू बाजार का साप्ताहिक हाट इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों का केंद्र है।

धार्मिक दृष्टि से, यहाँ बाबा फुलेश्वर नाथ महादेव मंदिर जैसे आस्था के केंद्र हैं। विकास के मुद्दे, विशेषकर सिंचाई और स्थानीय रोजगार, यहाँ के वोटरों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

पारू विधानसभा सीट पर बिहार चुनाव 2025 का मुकाबला 'चेहरा बड़ा या पार्टी' के सवाल का जवाब देगा। चार बार के विधायक अशोक कुमार सिंह के लिए यह उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता की सबसे बड़ी परीक्षा है, जबकि एनडीए को पार्टी की ताकत और प्रधानमंत्री के नाम पर भरोसा करके अपनी सीट बचानी होगी। राजद एंटी-इनकम्बेंसी और बागी उम्मीदवार का फायदा उठाने की कोशिश करेगी। यह चुनाव Bihar Politics में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।

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